महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना के दोनों गुटों के संभावित विलय को लेकर चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता अंबादास दानवे और शिवसेना के नेता अब्दुल सत्तार की छत्रपति संभाजीनगर के पास समृद्धि महामार्ग पर हुई मुलाकात और गले मिलने की तस्वीरों ने राजनीतिक गलियारों में नई अटकलों को जन्म दे दिया है। इससे पहले दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि शिवसेना के दोनों गुटों को एक साथ आने पर विचार करना चाहिए। दानवे ने कहा कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव के कारण क्षेत्रीय दल कमजोर हो रहे हैं और शिवसेना को अपनी ताकत बचाने के लिए एकजुट होना चाहिए। वहीं अब्दुल सत्तार ने भी संकेत दिया था कि यदि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे चाहें तो दोनों गुटों के बीच एकता की प्रक्रिया में देर नहीं लगेगी।
शिंदे ने चुप्पी साधी, संजय राउत क्या बोलो
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने विलय की अटकलों को ज्यादा महत्व नहीं दिया। उन्होंने कहा कि उनकी शिवसेना ही बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा को आगे बढ़ा रही है और उन्हें जनता का जनादेश प्राप्त है। शिंदे ने किसी भी संभावित विलय पर सीधी प्रतिक्रिया देने से परहेज किया। उधर शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने कहा कि यदि 2022 में शिंदे के साथ गए नेताओं को अपनी “गलती” का एहसास हो गया है तो उन्हें “मातोश्री” लौटकर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व को स्वीकार करना चाहिए। राउत ने दावा किया कि असली शिवसेना वहीं है, जहां ठाकरे परिवार है।
अब्दुल सत्तार ने किससे अनुमति ली थी-बावनकुले ने पूछा
इस बीच राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने शिंदे से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या अब्दुल सत्तार ने दोनों शिवसेना के विलय पर बयान देने से पहले उनकी अनुमति ली थी। बावनकुले ने कहा कि महायुति समन्वय समिति पहले ही संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों पर सार्वजनिक बयान देने से पहले सहयोगी दलों के नेताओं से अनुमति लेने का निर्णय कर चुकी है। फिलहाल दोनों शिवसेना गुटों के शीर्ष नेतृत्व की ओर से किसी औपचारिक बातचीत की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन दानवे और सत्तार के बयानों तथा मुलाकात ने महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा को जरूर तेज कर दिया है।

