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सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में परिसीमन आयोग के गठन को चुनौती देने वाली याचिका पर मांगा जवाब

जम्मू-कश्मीर में सीटों के निर्धारण के लिए परिसीमन आयोग गठित किये जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में सीटों के निर्धारण के लिए परिसीमन आयोग गठित किये जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार, जम्मू-कश्मीर प्रशासन और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हालांकि, कोर्ट ने परिसीमन आयोग गठित होने के करीब दो साल बाद याचिका दाखिल किये जाने पर भी सवाल उठाए। कश्मीर के रहने वाले दो लोगों हाजी अब्दुल गनी खान और डाक्टर मोहम्मद अयूब मट्टू ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर जम्मू-कश्मीर में विधानसभा और लोकसभा सीटों के निर्धारण के लिए परिसीमन आयोग गठित किये जाने को चुनौती दी है।

शुक्रवार को यह याचिका न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और एमएम सुंद्रेश की पीठ के समक्ष सुनवाई पर लगी थी। कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के बाद नोटिस जारी करते हुए सरकार और चुनाव आयोग को छह सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके बाद दो सप्ताह का समय याचिकाकर्ताओं के पास प्रति उत्तर दाखिल करने के लिए होगा। इस मामले में 30 अगस्त को फिर सुनवाई होगी।

इससे पहले याचिका पर बहस करते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में सीटों का निर्धारण करने के लिए गठित परिसीमन आयोग संवैधानिक प्रविधानों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि परिसीमन में सीमाओं का परिवर्तन नहीं किया जा सकता और न ही इसके जरिए सीटें बढ़ाई जा सकती हैं। इन दलीलों पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि परिसीमन आयोग दो साल पहले गठित हुआ था और वह अब इसे चुनौती दे रहे हैं।

कोर्ट ने पूछा कि क्या वह अनुच्छेद-370 और 35ए को निरस्त किये जाने को भी चुनौती दे रहे हंै। वकील ने कहा कि नहीं, हम उसे चुनौती नहीं दे रहे। लेकिन साथ ही जम्मू-कश्मीर के अब भारत में शामिल होने की बात कही। इस पर पीठ ने आपत्ति जताते हुए कहा कि आप इस तरह की दलील नहीं दे सकते। पीठ ने कहा कि जम्मू-कश्मीर हमेशा से भारत का हिस्सा था। सिर्फ विशेष प्रविधान खत्म किये गए हैं। कोर्ट में केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से पहले से पेश सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने परिसीमन से संबंधित नियम कानून और व्यवस्था को सामने रखा।

उन्होंने याचिका में की गई मांगों का विरोध किया। इस पर पीठ ने कहा कि वह मामले में जवाब दाखिल करें। तभी याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सरकार परिसीमन आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश कर देगी, इसके बाद मामला ज्यादा बहुत कठिन हो जाएगा। कोर्ट ने इस दलील पर नाराजगी जताते हुए कहा कि आप चाहते हैं कि कोर्ट सरकार को संसद में रिपोर्ट पेश करने से रोक दे। यदि आप इतने ही चिंतित थे तो फिर दो वर्ष बाद कोर्ट क्यों आये।

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