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लाउडस्पीकर का असहनीय शोर, ध्वनि प्रदूषण को नजरअंदाज करने वाले युवाओं का भविष्य अंधकारमय

लाउडस्पीकर का असहनीय शोर यह सब गैरकानूनी एवं अवैध है। इसका अनुसरण सभी राज्य करें तो देश की सुख-शांति के लिए बड़ा कदम होगा। साथ ही साथ ध्वनि प्रदूषण की विकराल होती समस्या पर भी लगाम लगेगी।

 शोर हमें व्यथित कर सकता है, विचलित कर सकता है, पर कभी भीतर की शांति प्रदान नहीं कर सकता। शोर का मुद्दा धार्मिक कतई नहीं है, यह एक सामाजिक मुद्दा है। शोर के खिलाफ आंदोलन होना चाहिए, लेकिन हो इसके विपरीत रहा है। अब धार्मिक स्थलों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के मामले को ही लें। वास्तव में यह मामला शोर के खिलाफ होना चाहिए, पर कुछ लोग इसे राजनीतिक रंग दे रहे हैं। राजनीति के कारण मूल मुद्दे से हमारा ध्यान भटक गया है। शोर के खिलाफ किया गया आंदोलन भी एक शोर में बदल गया है।

महाराष्ट्र में राज ठाकरे ने लोगों से कहा है कि जिन स्थानों से अजान की आवाज लाउडस्पीकरों से आएगी, उसके खिलाफ वे हनुमान चालीसा का पाठ करें। शोर के खिलाफ शोर अनुचित है। जरूरी है कि शोर के खिलाफ अपनी खामोश मुहिम चलाएं।यदि हम पूरे विश्व में लगातार बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण पर नजर डालें तो स्पष्ट होगा कि ध्वनि प्रदूषण का असर केवल इंसानों ही नहीं, बल्कि जानवरों एवं पेड़-पौधों पर भी पड़ रहा है। बड़े शहरों से लेकर सुदूर गांव भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। इससे इकोसिस्टम तक प्रभावित हो रहा है। अधिक शोर के कारण मेटाबालिज्म से संबंधित रोग, हार्ट अटैक, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज का खतरा बढ़ गया है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार तेज और लगातार होने वाले शोर से यूरोप में हर साल 48 हजार लोग हृदय रोग के शिकार हो रहे हैं।शोर से केवल इंसान ही नहीं, बल्कि जानवर भी काफी प्रभावित हो रहे हैं। उनमें भी सबसे ज्यादा पक्षी प्रभावित हो रहे हैं। वे अब ऊंचे स्वर में अपनी आवाज निकाल रहे हैं। सड़क किनारों के कीड़ों, टिड्डों और मेढकों की आवाज में भी बदलाव देखा गया है। इसके अलावा अनिद्रा, अति तनाव, चिंता तथा अन्य बहुत से स्वास्थ्य संबंधी विकार ध्वनी प्रदूषण से उत्पन्न हो सकते हैं।

लगातार प्रबल ध्वनि के प्रभाव में रहने वाले व्यक्ति की सुनने की क्षमता अस्थायी अथवा स्थायी रूप से कम हो जाती है। अधिक शोर में रहने वाले लोगों में कुछ नए रोगों का भी पता चला है। इसमें प्रमुख है रात में देखने की क्षमता में कमी आना, रंगों की पहचानने में दिक्कत, नींद का नियमित न होना और जल्दी थकान आना।आजकल युवा जिस तरह से डीजे की आवाज के साथ थिरक रहे हैं, उन्हें नहीं मालूम कि भविष्य में वे थिरकने के काबिल ही नहीं होंगे, क्योंकि उन्हें कुछ भी सुनाई ही नहीं देगा।

ध्वनि प्रदूषण को नजरअंदाज करने वाले युवाओं का भविष्य बहुत ही अंधकारमय है। वे न केवल बहरे हो सकते हैं, बल्कि उनकी याद्दाश्त एवं एकाग्रता में भी कमी आ सकती है। यही हाल रहा तो भावी पीढ़ी एक ऐसी अंधेरी दुनिया में होगी, जहां संवेदनाएं नहीं होंगी। लोग बहरे होंगे, संवेदनाएं केवल आंखों में ही दिखाई देगी। उसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होंगे। यदि कोई कुछ कहेगा तो सामने वाला उसे सुन नहीं पाएगा। सोचो कैसा होगा वह पल?

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