लाइफस्टाइल

खाने से लेकर शॉपिंग स्टोर तक, महामारी ने बदली लोगों की ये 10 आदतें

कोरोना महामारी के कारण हम अजीब समय में जी रहे हैं और अभी तक जीने के नए तरीके के पूरी तरह से अभ्यस्त नहीं हुए हैं।

कोरोना महामारी के कारण हम अजीब समय में जी रहे हैं और अभी तक जीने के नए तरीके के पूरी तरह से अभ्यस्त नहीं हुए हैं। भारतीय उपभोक्ताओं को घरों में बंद हुए और प्रतिबंधों के साथ जीते हुए एक साल का समय बीत चुका है। इस अवधि के दौरान उपभोक्ताओं ने कुछ पुरानी आदतों को पूरी तरह से बदल दिया है जबकि कुछ आदतों को यहां रहने के लिए समायोजित कर लिया है। कैंटर ने 2022 के 10 प्रमुख व्यवहारों को लेकर एनुअल ट्रेंड्स 2022 जारी किया है। 1- बड़े जीवन के लिए छोटे प्रयास पहले के समय में बड़े शहर युवाओं के सपनों और आकांक्षाओं को बड़ा बनाने की हवा देते थे। इससे उनका जीवन माचिस जैसे घरों, अराजक यातायात, व्यस्त कार्यक्रमों से घिरा था। अब इन शहरों में घिरे मिलेनियल्स (1981 के बाद जन्मे लोग) व्यस्त कॉरपोरेट जीवन शैली से राहत की तलाश में है। 59 फीसदी मिलेनियल्स का मानना है कि कोरोना महामारी ने पहले से मौजूद चीजों की सराहना करने में मदद की है। 2- घर जैसा खाना मिले महामारी ने उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य और इम्युनिटी का महत्व समझाया है। अब उपभोक्ता परिवार के साथ आराम की तलाश कर रहे हैं खासकर आशांति के समय में। उपभोक्ता खाने को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं। 72 फीसदी उपभोक्ता पैकेट वाले खाने के बजाए घर पर बने खाने को तरजीह दे रहे हैं। यदि खाना अपनी रसोई में नहीं बना है तो ऐसी जगह को प्राथमिकता दी जाती है जो हाइजीन और गुणवत्ता सुनिश्चित कर सके। 44 फीसदी का कहना है कि वे इन दिनों ऑनलाइन फूड को सुरक्षित नहीं मान रहे हैं।
3- स्किल बढ़ाने को लेकर ज्यादा सक्रियता विश्व आर्थिक मंच के अनुसार, 2022 तक मशीनें 7.5 करोड़ नौकरियों को खत्म कर देंगी। वहीं, मशीनों को चलाने के लिए 13.3 करोड़ नई नौकरियां पैदा होंगी। महामारी के कारण कंपनियों ने भी डिजिटल बदलाव पर फोकस बढ़ा दिया है। इस कारण उपभोक्ता इस साल स्किल बढ़ाने पर ज्यादा सक्रिय रहेंगे। 65 फीसदी लर्नर्स का कहना है कि वे अपने करियर की मजबूती के लिए स्किल बढ़ा रहे हैं। इसमें से 33 फीसदी लर्नर सीनियर स्तर के अधिकारी हैं। 4- गिग जॉब की ओर आकर्षण कोरोना महामारी के कारण भारत के फ्रीलांस नौकरी बाजार में तेजी आई है। काम के घंटों में लचीलेपन के कारण उपभोक्ताओं का गिग जॉब की ओर आकर्षण बढ़ रहा है। दूसरी ओर, पश्चिमी देशों के इस्तीफा देने के ट्रेंड का संकेत भारत में भी दिख रहा है। भारत के 62 फीसदी कामगार इस साल नौकरी बदलने पर विचार कर रहे हैं। अधिकांश गिग वर्कर कमाई के उच्च अवसर और काम के घंटों में लचीलेपन को महत्व दे रहे हैं। 1.5 करोड़ फ्रीलांसर्स के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गिग बाजार है।
5- निजी स्पेस में कमी वर्क फ्रॉम होम की शुरुआत ईमानदारी से काम करने के वादे के साथ हुई थी। कामगारों से उम्मीद की गई थी कि वे किसी भी समय काम के लिए उपलब्ध होंगे। लेकिन जल्द ही इसके लाभ कामगारों पर भारी पड़ने लगे और उनके काम और निजी जीवन पर असर दिखने लगा। भारत में 3 में से 1 कर्मचारी महसूस करता है कि वो काम बढ़ने और अप्रबंधनीय तनाव का सामना कर रहा है। कर्मचारी अपने निजी स्पेस की तलाश कर रहे हैं जो घर और काम की जिम्मेदारियों के बीच सिकुड़ गया है। 6- घर से बाहर जाने की तड़प सामाजिक दूरी के नियमों के तहत घरों में रहने और यात्रा प्रतिबंधों से अब लोग ऊब गए हैं। इस कारण लोग घरों से बाहर निकलना चाहते हैं। यात्रा प्रतिबंधों में ढील के साथ रेस्टोरेंट्स में भीड़ बढ़ रही है। रेस्टोरेंट्स में औसत ऑर्डर वैल्यू में 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वर्क फ्रॉम होम के दौरान लाइफस्टाइल प्रभावित होने से भी उपभोक्ता बाहर खर्च करने के लिए लालायित हैं। डाइनआउट के मुताबिक, लक्जरी डाइनिंग में 120 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 7- सोशल मीडिया बना नया शॉपिंग स्टोर कोरोना महामारी के दौरान ई-कॉमर्स में बढ़ोतरी के साथ ऑनलाइन खरीदारी के लिए सोशल कॉमर्स भी पसंदीदा स्थल के तौर पर उभरकर सामने आया है। सोशल मीडिया से खरीदारी से उपभोक्ताओं को वो अनुभव मिल रहा है जो ऑनलाइन स्टोर के माहौल में नहीं मिल रहा था। विचार-विमर्श, सीधे संदेश और वीडियो शेयरिंग जैसे फीचर से लोग सोशल कॉमर्स की ओर जा रहे हैं। वाटकंसल्ट के मुताबिक, देश के कुल ऑनलाइन खरीदारों में से 53 फीसदी सोशल कॉमर्स से खरीदारी कर रहे हैं। 8- पर्सनल केयर के चुनाव में सतर्कता वर्चुअल काम और सीमित सामाजिक सहभागिता के दौर में लोगों की अच्छा दिखने की दौड़ नहीं है। अब लोग प्रकृति, स्वास्थ्य और कल्याण पर आधारित अधिक स्थायी स्व-देखभाल अभ्यास की ओर बढ़ रहे हैं। उपभोक्ता अब अपने शरीर की देखभाल को लेकर ज्यादा जागरूक हो गए हैं। यही कारण है कि पर्सनल केयर से जुड़े उत्पादों का चुनाव करते समय अधिक सतर्कता बरती जा रही है और पूरी तरह से जांच पड़ताल के बाद ही खरीदारी हो रही है। 9- ब्रांडों का मूल्यांकन उपभोक्ताओं को विविधता अपनाने और सामाजिक समानता का समर्थन करने वाले ब्रांडों की ओर आकर्षित किया जा रहा है। आंदोलन में सबसे आगे रहने वाली जेड पीढ़ी ईमानदार दिखने वाले ब्रांडों का अब खुद मूल्यांकन कर रही है। यह पीढ़ी अपने आसपास बदलाव लाने के लिए सक्रिय कदम उठा रही है। डेलॉयट की 2021 मिलेनियल एंड जेन जेड स्टडी के मुताबिक, भारत की 36 फीसदी जेड पीढ़ी मूल्यांकन को लेकर खुद शिक्षित हो रही है। वहीं 37 फीसदी ने अपने आसपास के लोगों को शिक्षित करने और उनके विचारों को बदलने की कोशिश की। 10- वातावरण को लेकर जागरुक महामारी को जागृति के रूप में मानते हुए उपभोक्ता अब मानवीय लापरवाही के कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में पूरी तरह से जागरूक हैं और इसे अच्छा बनाने के लिए उत्सुक हैं। केंटर सस्टेनाबिलिटी फंडामेंटल रिपोर्ट 2021 के मुताबिक, 76 फीसदी उपभोक्ता समाचारों में आने वाले पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं। जबकि 77 फीसदी उपभोक्ता अच्छा काम करने वाली कंपनियों में समय और पैसा निवेश करने के लिए तैयार हैं।  

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button