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पारिवारिक बिखराव के शिकार न बनें बच्चे

तलाकशुदा दंपती के बच्चे अकेलेपन और अपराधबोध का आसानी से शिकार हो जाते हैं। इसलिए कोर्ट ने कहा कि तलाक के बाद अभिभावक बच्चों की परवरिश को लेकर व्यावहारिक सोच रखें ताकि वे माता-पिता के साझा प्रेम और स्नेह से वंचित न रहें।

बाम्‍बे हाई कोर्ट ने कहा है कि हर बच्चे को माता-पिता, दादा-दादी का प्यार व स्नेह पाने का अधिकार है तथा यह उनके व्यक्तिगत विकास एवं कल्याण के लिए आवश्यक है। न्यायालय ने पुणे के एक व्यक्ति और उसके माता-पिता को उसके बच्चों से मिलने की अनुमति देते हुए यह बात कही है। साथ ही इस बात का भी जिक्र किया कि जिन माता-पिता को बच्चों का संरक्षण करने का अधिकार प्राप्त नहीं है, उन्हें अपने बच्चों के साथ कुछ महत्वपूर्ण समय बिताने और उनके साथ का आनंद उठाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता के मुताबिक, वह करीब दो साल से अपने बच्चों से नहीं मिल पाया है।

रिश्तों की टूटन और वैवाहिक जीवन का बिखराव आज के दौर का कटु सच है। वैवाहिक संबंधों की उलझन में दंपती ही नहीं, दांपत्य जीवन से जुड़ा हर पहलू, हर इंसान प्रभावित होता है, जो समग्र रूप से पारिवारिक परिवेश और समाज पर भी असर डालता है। विचारणीय है कि पति-पत्नी के बीच उपजे आपसी मतभेदों के चलते स्थिति असहनीय हो जाए तो अलग हो जाने का मार्ग ही बचता है। हालांकि, बिखरते संबंधों के इसी मोड़ पर सबसे ज्यादा संवेदनशीलता, सजगता और समझ की भी दरकार होती है।

समझना मुश्किल नहीं कि तलाकशुदा दंपती के बच्चे अकेलेपन और अपराधबोध का आसानी से शिकार हो जाते हैं। बिखर चुके रिश्ते में अभिभावकों के बीच कड़वाहट, शिकायतें और आक्षेप लगाने का बर्ताव बच्चों को अपने भविष्य के प्रति आशंकित और आतंकित करता है। ऐसे में तलाक के बाद बच्चों की अभिरक्षा, परवरिश और जिम्मेदारी को विवाद का विषय बनाने के बजाय परिपक्व सोच के साथ इस साझे मोर्चे पर डटना जरूरी है। अलगाव के बाद बच्चों को हर पड़ाव पर आशंका नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में माता-पिता के साथ का आश्वासन मिलना चाहिए, वरना बच्चों के विचार और व्यक्तित्व अलगाव के दुष्प्रभाव से नहीं बच सकते। इतना ही नहीं बढ़ती दूरियां और कटुता उन्हें अभिभावकों के साथ-साथ घर के बुजुर्गों के स्नेह से भी वंचित कर देती हैं।

हाल के वर्षों में वैवाहिक रिश्तों की उलझनें और तलाक के आंकड़े तेजी से बढ़े हैं। दुखद है कि इसी अनुपात में बच्चों के संरक्षण और परवरिश से जुड़े विवाद के मामले भी सामने आने लगे हैं। बालमन को बिना गलती के ही अकेलेपन और रिश्तों की उलझनों का दंश झेलना पड़ रहा है। यही वजह है कि ऐसे मामलों में निर्णय देते हुए न्यायालय द्वारा भी बच्चों की सुरक्षा एवं देखभाल के पक्ष पर प्राथमिकता से विचार किया जाता है। जरूरी है कि तलाक के बाद अभिभावक भी बच्चों की परवरिश को लेकर व्यावहारिक सोच रखें, ताकि बच्चे अपने माता-पिता के साझा प्रेम और बुजुर्गों के स्नेह-आशीर्वाद से वंचित न हों।

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