स्वास्थ्य

भारत में नवजात बच्‍चों में बढ़ रही जन्‍मजात दिल की बीमारी,

बच्‍चों में सीएचडी यानि जन्‍मजात दिल की बीमारी के 85 प्रतिशत मामलों में बीमारी का कारण पता नहीं है.

वहीं देश में सालाना इस बीमारी के साथ पैदा होने वाले ढाई लाख बच्‍चों में से सिर्फ 10-15 फीसदी को ही पर्याप्‍त इलाज मिल पाता है.

. भारत में नवजात और छोटे बच्‍चों में जन्‍मजात दिल की बीमारियों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है. देश में सालाना करीब ढाई लाख बच्‍चे सीएचडी यानि कॉन्‍जेनिटल हार्ट डिजीज (Congenital Heart Disease) से पीड़‍ित पैदा हो रहे हैं. जबकि इलाज के मामले में अभी भी हमारा देश फिसड्डी है. इतनी बड़ी संख्‍या में दिल की बीमारी से जूझ रहे बच्‍चों में से सिर्फ 10-15 फीसदी बच्‍चों को ही पर्याप्‍त इलाज मिल पा रहा है. यही वजह है कि युवा होने से पहले तक हजारों बच्‍चों की इससे मौत हो जाती है. विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 (Covid-19) ने इस बीमारी के इलाज में दिक्‍कतें पैदा करके कोढ़ में खाज का काम किया है. कोरोना की वजह से बच्‍चों में दिल की बीमारी के मामले या तो मिसडायग्‍नोस रहे हैं या अंडर डायग्‍नोस हुए हैं जो कि बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिहाज से चिंता की बात है. आम भाषा में समझें तो बच्‍चों के दिल में छेद से लेकर खून की नसों का सिकुड़ना, वॉल्‍व में परेशानी, आर्टरी का ब्‍लॉक होना आदि परेशानियां सामने आ रही हैं. हाल ही में ऑल इंडिया इंस्‍टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली की जानी-मानी बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रोफेसर अनीता सक्सेना की ओर से हाल ही में आए एक अनुसंधान पेपर में बताया गया कि सबसे ज्‍यादा उत्तरी भारत में करीब 14000 बच्‍चे सालाना गंभीर सीएचडी की बीमारी के साथ पैदा होते हैं. जिन्‍हें जन्‍म के पहले साल में ही इलाज की जरूरत होती है. जबकि दक्षिणी और उत्तर पूर्वी भारत में 6500 और 1500 नवजात शिशुओं को ये बीमारी जन्‍म के समय होती है. लेकिन खास बात है कि इनमें से उत्‍तर भारतीय राज्‍यों के सिर्फ 17 फीसदी बच्‍चों को ही इलाज मिल पाता है. जबकि दक्षिण भारत के 72% और पूर्वी उत्‍तर भारत के 0 फीसदी बच्‍चों को सही उपचार मिल पाता है. ऐसे में बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिहाज से ये बेहद चिंताजनक है. बच्‍चों में दो प्रकार की मिल रहीं जन्‍मजात दिल की बीमारियां 1. असायनोटिक कॉन्जेनिटल हर्ट डिजीज या डिफैक्‍ट (Acyanotic congenital heart defects) .वेंट्रिकुलर सेप्‍टल डिफैक्‍ट ( Ventricular septal defect or VSD). . एट्रियल सेप्‍टल डिफैक्‍ट Atrial septal defect or ASD). . पेटेंट डक्‍टस आर्टेरिऑसिस (Patent ductus arteriosus or PDA) . पल्‍मोनरी वॉल्‍व स्‍टेनोसिस ( Pulmonary valve stenosis) 2. सायनोटिक कॉन्‍जेनिटल हर्ट डिफेक्‍ट (cyanotic congenital heart defects) टेट्रालॉजी ऑफ फेलॉट (Tetralogy of Fallot) . ट्रांस्‍पोजिशन ऑफ द ग्रेट वेसेल्‍स (Transposition of the great vessels) . पल्‍मोनरी एट्रेसिया (Pulmonary atresia) . हाइपोप्‍लास्टिक लेफ्ट हार्ट सिंड्रोम (Hypoplastic left heart syndrome) . ट्रायकस्‍पिड वॉल्‍व एब्‍नोर्मेलिटीज (Tricuspid valve abnormalities) 85 फीसदी मामलों में नहीं पता बीमारी की वजह बाल ह्रदय रोग विशेषज्ञ और रामा मेडिकल कॉलेज, हापुड़ में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ वीरेंद्र यादव कहते हैं कि बच्‍चों में सीएचडी के 85 प्रतिशत मामलों में बीमारी का कारण पता नहीं है. सिर्फ 10-15 फीसदी रोगियों में ही आनुवंशिकता की भूमिका पाई जाती है. हालांकि गर्भावस्‍था के दौरान मांओं को होने वाले वायरल यानि रूबेला नवजात शिशुओं में सीएचडी की उपस्थिति के साथ गहरा संबंध पाया गया है. वहीं अगर किसी मां को मधुमेह है या वह धूम्रपान या शराब का सेवन करती है तो भी नवजात को सीएचडी होने की संभावना बढ़ जाती है. इसके अलावा गर्भावस्था की पहली तिमाही के दौरान, विशेष रूप से टेराटोजेनिक दवाओं का सेवन, गर्भवती महिला का अनानुपातिक बीएमआई , माता-पिता की बढ़ती उम्र, सगोत्रीय विवाह, इन-विट्रो फर्टीलाईजेशन तकनीक से गर्भाधान वे अन्य प्रमुख कारण हैं जिन्हें सीएचडी पैदा करने वाले कारणों में शामिल किया जा सकता है. इसके अलावा परिवार में अगर किसी को ये बीमारी है तो भी बच्‍चे को ये समस्‍या हो सकती है. रोकथाम के लिए माता-पिता का जागरुक होना जरूरी विजयताड़ा के एस्टर रमेश अस्पताल में सलाहकार, बाल चिकित्सा कार्डियोलॉजी डॉ. मुर्तजा कमल कहते हैं कि निवारण हमेशा इलाज से बेहतर है. सीएचडी की रोकथाम मुश्किल है क्योंकि ज्यादातर मामलों में इसका कारण पता ही नहीं है. महिलाओं को शिक्षित करने और महिलाओं के सशक्तिकरण से इस क्षेत्र में मदद मिल सकती है. इसके साथ ही जिन कारणों की जानकारी है उसे लेकर भावी माता-पिता की काउंसलिंग की जानी चाहिए. सीएचडी की जांच के लिए फीटल इको एक जरूरी उपकरण है. इससे जांच गर्भावस्‍था के 18-20 वें सप्ताह में होती है, ऐसे में अगर चिकित्‍सक सलाह देते हैं तो परिजनों को इस जांच को जरूर कराना चाहिए ताकि बच्‍चे का भविष्‍य बेहतर रहे. अगर जन्‍म के समय या उसके तुरंत बाद बच्‍चे में बीमारी का पता चल गया है तो उसमें देरी न करें, बल्कि तत्‍काल बीमारी का निदान कराएं, नहीं तो यह बढ़कर परेशानी पैदा कर सकती है. डॉ. कमल कहते हैं कि भोजन में फोलिक एसिड की खुराक ने कनाडा के दो अध्ययनों में सीएचडी की कमी पर प्रभाव दिखाया है. ऐसे में फॉलिक एसिड का फोर्टीफिकेशन और सप्लीमेंट एक अन्य रणनीति है जिसका उपयोग हमारे देश में सीएचडी के जन्म के प्रसार को कम करने के लिए किया जा सकता है और किया भी जा रहा है. मातृ मधुमेह और उच्च रक्तचाप का उचित और पर्याप्त नियंत्रण, शराब के सेवन पर रोक, गर्भवती महिला के द्वारा सक्रिय या निष्क्रिय धूम्रपान से बचना, टेराटोजेनिक दवाओं के उपयोग से बचने की सलाह दी जा सकती है. वर्तमान में में हमारे देश में सिर्फ 130 हृदय बाल रोग विशेषज्ञ हैं, जिनकी संख्‍या को बढ़ाया जाना जरूरी है.  

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