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तालिबान के खिलाफ फरीबा मोहेबी की कविता बनी हथियार,मेरिकी और अफगानी छात्राओं के बीच एक पुल का काम कर रही है।

अफगानिस्तान के मावुद में रहने वाली 11वीं कक्षा की छात्रा फरीबा मोहेबी को सितंबर में पता चला कि तालिबान हुकूमत में स्कूल खुलने पर भी लड़कियां पढ़ने नहीं जा सकेंगी

अफगानिस्तान के मावुद में रहने वाली 11वीं कक्षा की छात्रा फरीबा मोहेबी को सितंबर में पता चला कि तालिबान हुकूमत में स्कूल खुलने पर भी लड़कियां पढ़ने नहीं जा सकेंगी। इस खबर ने फरीबा को अंदर तक झकझोर दिया। वो इस कदर टूट चुकीं थी कि कमरे के खिड़की दरवाजे बंद कर फूट-फूट कर रोने लगीं। उनकी इसी हताशा से एक कविता निकली ‘व्हाय वाज आई बॉर्न अ गर्ल’। आज यही कविता अमेरिकी और अफगानी छात्राओं के बीच एक पुल का काम कर रही है।

फरीबा की इस कविता को जब मावुद से 13 हजार किलोमीटर दूर अमेरिका के कैन्यन क्रेस्ट एकेडमी में वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए दिखाया गया तो इसने अमेरिकी छात्रों को झकझोर दिया। इस कविता ने मावुद की छात्राओं को उम्मीद की नई रोशनी दिखाई। कैन्यन क्रेस्ट एकेडमी की छात्राओं ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए मावुद इंस्टिट्यूट की छात्राओं से बात की। इससे अफगानी छात्राओं को उम्मीद की नई रोशनी मिली। कई परेशानियों के बाद भी उनके शिक्षा पाने के संकल्प मजबूत हुआ।

अफगानी कविता से प्रेरणा पा रहे अमेरिकी छात्र क्रेस्ट एकेडमी की छात्रा सेलेना जियांग ने कहा- बम धमाकों का सामना करने के बाद पुरुष छात्रों के साथ बैठकर कैसे पढ़ा जा सकता है, मैं तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती। बहुत हिम्मत चाहिए इसके लिए। यहां हमारी जिंदगी बहुत अलग है, हमें तो चांदी की थाली में शिक्षा दी जाती है। एक अन्य छात्रा डियाना रीड ने कहा कि मैं इन छात्राओं का 10% साहस भी रखती तो शेरनी होती।

हमें खुशी है कि हम दुनिया में अकेले नहीं हैं मावुद के प्रिंसिपल नजीबुल्लाह युसेफी ने अमेरिकी छात्रों से कहा, हम बहुत खुश हैं कि दुनिया में अकेले नहीं हैं। दुनिया के दूसरी तरफ कुछ खूबसूरत दिमाग हैं, जो हमारी चिंता करते हैं। अमेरिकी टीचर टिमोथ स्टीवन और युसेफी ने यह व्यवस्था शुरू की थी। चर्चा का शुरुआती विषय फरीबा की ही कविता थी। इस कविता स्कूल की पत्रिका में भी प्रकाशित किया गया है। इससे सैकड़ों छात्र प्रेरित हो रहे हैं।

अब मैं जो चाहती हूं, वो बनकर रहूंगी 16 साल की फरीबा ने कहा- अमेरिकी छात्रों ने हमें अपने लक्ष्य को पाने के लिए प्रेरित किया है। मेरे लक्ष्य बहुत बड़े हैं। मैं कवि और कैंसर रिसर्चर बनना चाहती हूं। वहीं, एक अन्य छात्रा जाल्मा ने कहा कि तालिबान के लौटने के बाद सिर्फ अंधेरा था, हमने उम्मीद खो दी थी। पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ने मुझमें हिम्मत पैदा की है। अब मैं जो चाहती हूं, वो बनकर रहूंगी।’ मावुद इंस्टिट्यूट की दीवार पर लिखा है… सपने तब तक काम नहीं करते, जब तक आप नहीं करते… इन छात्राओं ने इस बात को जेहन में बैठा लिया है

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