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यूक्रेन पर हमले के बाद ताइवान और चीन मामला उठने की वजह क्या है?

रूसी सेना के यूक्रेन पर धावा बोलने के कुछ समय बाद ही चीन की तरफ से भी ताइवान की धरती पर लड़ाकू विमान भेज दिए गए हैं।

रूसी सेना के यूक्रेन पर धावा बोलने के कुछ समय बाद ही चीन की तरफ से भी ताइवान की धरती पर लड़ाकू विमान भेज दिए गए हैं। एक महीने के अंदर चीन के लड़ाकू विमानों ने 12 बार ताइवान में घुसपैठ की है। गुरुवार को चीन के 9 लड़ाकू विमान ताइवान के आसमान पर देखे गए हैं।

यूक्रेन पर हमले के बाद ताइवान और चीन मामला उठने की वजह क्या है?

  • यूक्रेन पर हमला करने के कुछ दिन पहले ही रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीन पहुंचे थे। इस दौरान पुतिन ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मिलकर 5,300 से ज्यादा शब्दों का एक जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया तो पूरी दुनिया हैरान रह गई। इस जॉइंट स्टेटमेंट में रूस ने ताइवान के मामले में चीन का समर्थन किया है।
  • इसके अलावा यूक्रेन-रूस जंग शुरू होने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चीन (CCP) द्वारा मीडिया के लिए सेंसरशिप जारी की गई है। इस सेंसरशिप निर्देशों को गलती से चीनी मीडिया ने सोशल मीडिया पर जाहिर कर दिया। इसमें रूस के साथ भावनात्मक और नैतिक सपोर्ट बनाए रखने की बात कही गई है। साथ ही ताइवान पर कब्जे की मंशा भी जाहिर की गई है।

यही वजह है कि यूक्रेन पर रूस के हमला के बाद अब ताइवान पर चीन के कब्जा करने की मंशा को लेकर मीडिया में चर्चा तेज हो गई है।

इस वक्त चीन और रूस दोनों के साथ आने की वजह क्या है?

एक कहावत है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। चीन की लड़ाई अमेरिका से है और अब रूस की भी लड़ाई अमेरिका से है। ऐसे में चीन और रूस का साथ आना स्वाभाविक है। बीते दिनों जॉइंट स्टेटमेंट में दोनों देशों ने 2 मुख्य बातों पर जोर दिया है-

  • यूक्रेन के मामले में चीन रूस को मदद करके यूरोप में अमेरिका की स्थिति को कमजोर करेगा।
  • इसी तरह साउथ चाइना सी से अमेरिका को बाहर करने के लिए रूस चीन का साथ देगा।

इन दो बातों के जरिए रूस और चीन ने दुनिया को साफ संकेत दिया है कि वह अपने पड़ोस में दखल बर्दाश्त नहीं करेंगे। दोनों देशों के साथ आने की मुख्य 3 वजह ये हैं…

  1. चीन और रूस की विस्तारवादी नीति का अमेरिका विरोध करता है। इनमें साउथ चाइना सी, ताइवान और यूक्रेन का मामला शामिल है।
  2. रूस अपने कुल एक्सपोर्ट का 14.3% सामान चीन में बेचता है। यही वजह है कि अमेरिका और यूरोप से टकराने के लिए रूस को चीन का साथ जरूरी है।
  3. रूस और चीन दोनों ही देशों की विदेश नीति यूरोप और अमेरिका के खिलाफ है। दोनों देशों के साथ आने की एक वजह यह भी है।

चीन और ताइवान की लड़ाई का इतिहास क्या है?

  • चीन और ताइवान की आपसी लड़ाई की कहानी 1949 से शुरू होती है। इसके पहले दोनों देश एक ही थे। दरअसल, 1949 में कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग के नेतृत्व में चियांग काई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी की सरकार के खिलाफ गृहयुद्ध छेड़ा गया। इसमें माओत्से तुंग और उनके समर्थकों की जीत हुई।
  • इसके बाद चियांग काई शेक अपने समर्थकों के साथ समुद्र पार कर ताइवान नाम के टापू पर पहुंच गए। कम्युनिस्टों के पास सेना लेकर समुद्र पार करने के लिए साधन नहीं थे, इसलिए वे ताइवान नहीं गए। इसके बाद चीन में माओत्से तुंग ने सरकार बना ली। वहीं, ताइवान में चियांग काई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी की सरकार बनी।
  • असली लड़ाई इसके बाद शुरू हुई, जब माओ ने कहा कि पूरे चीन में जीत उनकी हुई है तो ताइवान पर उनका अधिकार है। वहीं, कॉमिंगतांग का कहना था कि बेशक चीन के कुछ हिस्सों में उनकी हार हुई है, मगर वे ही चीन का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • इसी वजह से ताइवान ने अपना ऑफिशियल नाम ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ रखा है, जबकि अभी के चीन का नाम ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ है। 1950 के बाद से ही चीन, ताइवान को अपने देश में मिलाना चाहता है।
  • चीन के लिए इन 4 वजहों से बेहद खास है ताइवान

    हांगकांग और वियतनाम के बाद अब चीन की विस्तारवादी नीति के तहत निगाहें ताइवान की ओर हैं। इसकी मुख्य वजहें हैं…

    1. ताइवान अंतरराष्ट्रीय सेमी-कंडक्टर व्यवसाय का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में चीन के लिए बिजनेस के लिहाज से ताइवान बेहद खास है।

    2. चीन का दावा है कि ताइवान हमेशा से ही उसका हिस्सा रहा है। ऐसे में चीन ताइवान पर कब्जा कर अपना पुराना गौरव लौटाना चाहता है।

    3. साउथ चाइना सी में किसी भी देश को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ताइवान को अपने कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी है।

    4. ताइवान में अमेरिकी सैनिकों का अड्डा है। चीन एशिया से अमेरिकी सेना को बाहर करने के लिए ताइवान पर कब्जा करना चाहता है।

  • चीन के लिए ताइवान पर कब्जा करना कैसे आसान हो सकता है?

    BBC को दिए इंटरव्यू में प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि चीन के लिए सैन्य ताकत के बल पर ताइवान को अपने देश में मिलाना मुश्किल हो सकता है, लेकिन कई वजहें हैं जो चीन को आसानी से ताइवान से जोड़ सकती हैं। जैसे..

    1. पीपुल टु पीपुल कॉन्टैक्ट दोनों देशों की राजनीतिक दूरियों को खत्म कर सकता है। इससे चीन और ताइवान करीब आ सकते हैं।

    2. दोनों जगहों के नागरिकों की संस्कृति, भाषा और इतिहास एक हैं। ऐसे में राजनीतिक दूरियां खत्म होने पर दोनों का करीब आना आसान हो सकता है।

    3. ताइवान की सरकार और लोगों को जब लगेगा कि पश्चिम या अमेरिका ने उन्हें अकेले छोड़ दिया है। हालांकि, इसकी संभावना अभी कम नजर आती है।

    4. इकोनॉमिकली जब ताइवान और चीन के संबंध अच्छे होंगे तो नजदीकियां बढ़ सकती हैं।

    5. इस वक्त अमेरिका या NATO के लिए एक साथ यूरोप और एशिया में दो गंभीर मुद्दों को एक साथ सुलझाना मुश्किल हो सकता है। इससे वर्ल्ड वॉर जैसी स्थिति बन सकती है।

  • चीन के लिए ताइवान, यूक्रेन जितना आसान क्यों नहीं?

    चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पिछले साल अक्टूबर में घोषणा की थी कि ताइवान के साथ देश के मिलने का सपना जल्द पूरा होगा। इसके बाद से ही चीन अक्सर ताइवान को डराने के लिए अपने फाइटर जेट उसकी सीमा में उड़ाता रहता है। 22 जनवरी 2022 को ताइवान की सीमा में चीन के रिकॉर्ड 32 फाइटर एयरक्राफ्ट ने उड़ान भरी थी।

    इन एयरक्राफ्ट को अपनी सीमा से बाहर खदेड़ने के लिए ताइवान ने पिछले 2 साल में 7.46 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

    चीन भले ही ताइवान को डरा रहा हो, लेकिन ड्रैगन इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि उसके लिए ताइवान पर कब्जा करना आसान नहीं है। इसकी मुख्य वजह ये हैं..

    • चीन के लिए ताइवान, यूक्रेन नहीं है। इसे इससे समझा जा सकता है कि 1979 में अमेरिकी कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पास करके ताइवान को आर्थिक और सैन्य स्तर पर मदद करने की घोषणा की थी। तब से आज तक अमेरिका ताइवान को मदद कर रहा है। ऐसे में अमेरिका आसानी से ताइवान को अपने हाथ से जाने नहीं देगा।
    • NATO के साथ जुड़ने पर यूक्रेन का पक्ष अभी तक साफ नहीं रहा है। वहीं, ताइवान 1950 के बाद से ही सीधे अमेरिका से जुड़ा है।
    • ताइवान पर कब्जा करने के लिए चीन को सिर्फ अमेरिका नहीं, जापान से भी दो-दो हाथ करने पड़ सकते हैं। ऐसा चीन के लिए आसान नहीं होगा।
    • इंडो पैसिफिक क्षेत्र के देश आने वाले समय में दुनिया की कुल GDP में 50% से अधिक योगदान देंगे। ऐसे में यहां अमेरिका अपनी स्थिति कमजोर नहीं होने देना चाहेगा।
    • साउथ चाइना सी से होकर 3 लाख करोड़ का सामान हर साल एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट होता है। ऐसे में यहां चीन को टक्कर देने के लिए अमेरिका हर हाल में ताइवान को बचाएगा।

    चीन से लड़ने में ताइवान को ऐसे मदद कर रहा है अमेरिका

    • ताइवान ने समुद्री सतह से आसमान या पानी के अंदर मार करने वाली 46 MK-48 मिसाइल (टॉरपीडो) अमेरिका से 2017 में खरीदी।
    • एक टॉरपीडो की कीमत 74.65 करोड़ रुपए है, लेकिन ताइवान ने अमेरिका से ये 40.31 लाख रुपए में खरीदा था। मतलब साफ है कि अमेरिका ताइवान को काफी कम कीमत पर हथियार मुहैया कराता है।
  • 20 मई 2016 को साई इंग वेन ताइवान की राष्ट्रपति बनीं। 20 जनवरी 2017 को डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने। इसके बाद दोनों देशों के बीच कई हथियार सौदे हुए।

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