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Holi Special – बिच्छुओं के साथ होली मनाने की अनोखी परंपरा

Bichchu Holi - सैकड़ों वर्षों से चली आ रही प्रथा

-बिच्छुओं से होली खेलने की है अनोखी परंपरा -एक दूसरे पर फेंकते हैं बिच्छू -सौंथना गांव में खेलते हैं बिच्छुओं की होली -सैकड़ों वर्षों से चली आ रही प्रथा

होली एक ऐसा रंगों का त्यौहार है, जिसे देश ही नहीं विदेशों में भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंगबिरंगे कलर लगाते है और गले लगाकर एक दूसरे को होली की बधाइयाँ देते हैं, वैसे तो देश के कई शहरों में होली मनाने का अपना अलग-अलग अंदाज है, जैसे कि वृंदावन में फूलों के साथ, तो बरसाने में लट्ठ मार होली मनाई जाती है। इसके अलावा बाबा की नगरी काशी में मणिकर्णिका घाट पर मुर्दों की राख से होली खेली जाती है। लेकिन आपको यह जानकार हैरानी होगी कि एक जगह ऐसी भी है, जहाँ पर बिच्छुओं से होली खेली जाती हैं, जी हाँ….. हम बात कर रहे हैं…… उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के ऊसराहार इलाके के सौंधना गांव की, यहाँ पर बिच्छुओं के साथ होली खेलने की परंपरा है। वर्षों पुरानी यह पंरपरा आज भी इस गांव में जिंदा है।

आपको बता दें कि फाग की थाप पर इस गांव में सैकड़ों की संख्या में बिच्छू अपने बिलों से बाहर आ जाते हैं और फिर गांव में बड़े हों या बच्चे सभी बिच्छुओं से होली खेलते हैं। यहाँ के लोग बिच्छुओं को हाथों में उठाकर एक दूसरे पर फेंकते भी हैं। हैरानी की बात तो यह है कि इस दिन बिच्छू भी अपना जहरीला स्वभाव छोड़कर अबीर गुलाल संग होली खेलते हैं। बच्चे इन बिच्छुओं को पकड़कर खूब खेलते हैं और एक दूसरे पर फेंकते भी हैं।

बताया जाता है कि सौंथना गांव के बाहर भैंसान नाम का प्राचीन टीला है और इस टीले पर हजारों की संख्या में ईंट और पत्थरों के टुकड़े पड़े हुए हैं, जिन्हें आमतौर पर लोग हटाते हैं, तो नीचे कुछ नहीं दिखता है, लेकिन होली पूर्णिमा के दूसरे दिन परिवा की शाम को जब बड़े, बुजुर्ग और बच्चे टीले पर एकत्र होते हैं और फाग गायन की शुुरुआत करते हैं, तो ईंट-पत्थरों के बीच ना जाने कहां से हजारों की संख्या में जहरीले बिच्छूओं का निकलना शुरू हो जाता है। इस दौरान सभी के शरीर पर बिच्छू रेंगते रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे बिच्छू गले मिलकर होली की बधाई दे रहे हों। बच्चे एक दूसरे पर बिच्छुओं को फेंककर खेलते हैं लेकिन वे उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। इसके अलावा टीले से जाने से पहले गांव के बच्चे बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं और फिर बिच्छुओं को वहीं पर छोड़ देते हैं और अगले दिन टीले पर एक भी बिच्छू भी नहीं दिखता है।

माना जाता है किसी समय इस टीले पर भैंसों की बलि दी जाती थी। बताया जाता है कि यहां पर पहले कोई मंदिर भी था लेकिन मुगलों के समय युद्ध में उसे ध्वस्त कर दिया गया था, इसकी पुष्टि यहां पड़़े मूर्तियों के टूटे अवशेषों से होती है। आज भी गांव के लोग इस टीले को भैसान बाबा के रूप में पूजते हैं और गांव में जब किसी की शादी होती है, तो तेल चढ़ाने की पंरपरा इसी टीले पर निभाई जाती है और साथ ही लोग यहां आकर मन्नत भी मानते हैं और पूरी होने पर पूजा करते हैं। इसके साथ ही ग्राम प्रधान उमाकांत शुक्ला कहते हैं कि भैसान टीले पर होली की परिवा को फाग गायन के समय बिच्छूओं के निकलने की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।

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