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मुंबई आकर दर-दर भटकने को मजबूर हो गए थे जावेद अख्तर

जावेद अख्तर, गीत-गजलों और शायरी की मशहूर शख्सियत है।सिनेमा, कला और साहित्य की दुनिया में जावेद अख्तर साहब का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। इसके पीछे वजह है उनकी प्रतिभा, ज्ञान और उनका नाम।वह नाम जो उन्होंने संघर्ष के कड़े दौर से गुजर कर बनाया है।

जावेद अख्तर, गीत-गजलों और शायरी की मशहूर शख्सियत है।सिनेमा, कला और साहित्य की दुनिया में जावेद अख्तर साहब का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। इसके पीछे वजह है उनकी प्रतिभा, ज्ञान और उनका नाम।वह नाम जो उन्होंने संघर्ष के कड़े दौर से गुजर कर बनाया है।जावेद अख्तर साहब का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में मशहूर शायर रहे जांनिसार अख्तर के घर हुआअख्तर का असली नाम जादू था। उनके पिता जांनिसार अख्तर की नज्म ‘लम्हा किसी जादू का फसाना होगा’ से उनका ये नाम रखा गया था।आज की तारीख में जावेद अख्तर की खुद की शख्सियत काफी बड़ी है,लेकिन वह जिस खानदान से ताल्लुक रखते हैं उसका भी अपना एक इतिहास है। वह जांनिसार अख्तर और मशहूर लेखिका सफिया अख्तर के बेटे हैं। प्रसिद्ध रससिद्ध शायर मुज्तर खैराबादी जावेद के दादा थे और मुज्तर के पिता सैयद अहमद हुसैन एक कवि थे, मुज्तर की मां हिरमां उन्नीसवीं सदी की चंद कवियत्रियों में से एक रहीं और उनके पिता फजले-एहक खैराबादी अरबी के शायर थे।इतनी बड़ी शख्सियत के बेटे होने के बाद भी जावेद अख्तर साहब को इंडस्ट्री में पैर जमाने के लिए खूब संघर्ष करना पड़ा।’कल हो ना हो’, ‘वेक अप सिड’, ‘वीर-जारा’ और ‘लगान’ जैसी फिल्मों के गाने लिखने वाले गीतकार और शायर जावेद अख्तर सिनेमाई दुनिया की एक हस्ती हैं।जावेद अख्तर ने भी अपने परिवार की लेखन परंपरा को कायम रखा और वह ग्वालियर,लखनऊ,अलीगढ़ और भोपाल के बीच अपना सफर कायम करते रहे। इसके बाद मायानगरी में आकर तमाम संघर्ष से गुजरने के बाद एक सफल गीतकार और पटकथा लेखक के तौर पर खुद को स्थापित किया।बताया जाता है कि जावेद अख्तर को मुंबई आने के छह दिन बाद ही अपने पिता का घर छोड़ना पड़ा था और दो साल तक किसी ठिकाने के लिए परेशान होते रहे। इस बीच उन्होंने सौ रुपए महीने पर डॉयलॉग लिखे थे और कुछ अन्य छोटे-मोटे काम किए।ऐसी भी नौबत आई कि उन्होंने चने खाकर पेट भरा और पैदल सफर किया।

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