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#JoshimathCrisis – जोशीमठ -त्रासदी का नया अध्याय (पार्ट टू)

घर से विरत कर देना कोई स्थायी समाधान नहीं है

जोशीमठ में जो कुछ हो रहा है ये कोई एक दिन की बात नहीं थी। ये मैने अपने पहले एपीसोड के लेख में बताया । आज हम ये भी देखेंगे कि क्या वाकयी ये मामला केवल जोशीमठ तक हीं सीमित है या इसका दायर अल्मोड़ा के दूसरे इलाकों में भी भयावह रुप ले रहा है । जी हाँ ये मामला भूधंसाव का केवल जोशीमठ तक हीं नहीं है बल्कि कर्ण प्रयाग और उत्तरकाशी से भी ऐसे हीं मकानों में दरार पड़ने की खबर आ रही है । कर्ण प्रयाग में भी करीब तीन से चार दर्जन मकानों में वही हालात पैदा हो गया है जो जोशीमठ में देखने को मिल रहा है । यहां के लोगों के माथे पर भी जोशीमठ में पैदा हुये हालात ने चिंता की लकीर खींच दी है । उत्तरकाशी के भी कुछ इलाकों में घरों में दरार पहले भी देखा गया है वहां की आबादी भी किसी अनहोनी से अब दहशत में आ गयी है । खुद उत्तराखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी माना है कि पहाड़ों के जीवन में इस तरह की दुश्वारियां आती रहती हैं । लेकिन ये कह भर देने से काम नहीं चलने वाला है । मौजूदा सरकार को कम से कम ये तो देखना हीं पड़ेगा कि अगर बसी बस्ती को छोड़कर लोग विस्थापित होतें हैं तो भारी भरकम महकमा आखिर क्यों नहीं लोगों के विस्थापन के लिये कोई ठोस नीति घोषित कर रही है । केवल तत्काल लोगों को उनके घर से विरत कर देना कोई स्थायी समाधान नहीं है । लोगों की चिंता है कि आखिर वो अपना पुस्तैनी घर गृहस्थी छोड़कर कही जायेंगें भी तो करेंगें क्या ? लोगों की पुस्तैनी जमीन से लेकर संपत्ति का आकलन करने के लिये सरकार के पास क्या प्लान है  ? क्या सरकार विस्थापितों के रोजी रोजगार से लेकर जीवनचर्या को लेकर कोई ठोस नीति पर काम करेगी ? ये सवाल पीड़ितों को चिंता में डाल रही है । केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकार के नुमाइंदों का आज यहां पर जमावड़ा है । सत्ता के शीर्ष पर रहे हरीश रावत मौन व्रत पर चले गये हैं । लोगों में आक्रोश है कि जब तक सरकार की ओर से विस्थापन की नीति सामने नहीं लायी जाती किसी भी तरह से मकानों के ध्वस्तीकरण नहीं होने दिया जायेगा । लोग मजबूर हैं धरना प्रदर्शन का दौर जारी है । लोगों की नाराजगी भी वाजिब है कि आखिर जब लोग एसडीएम और तमाम सक्षम अधिकारियों से मकान में आ रहे दरार की शिकायत की तो क्यों नहीं एक डेढ़ साल पहले कोई कार्यवाई की गयी । तब शायद ये विपदा इतनी विकराल नहीं थी इसलिय व्यवस्था के कान पर जूं तक नहीं रेंगी । लेकिन जब खबरिया चैनलों का मुद्दा बना और हर तरफ इस मुद्दे पर चर्चा गरमायी तो फिर मुख्यमंत्री तक जोशीमठ में रात्रि विश्राम कर रहे हैं । केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय हो या प्रधानमंत्री कार्यालय इस वाकये को लेकर संजीदा बनने में जुट गया है । हमने आपसे साझा किया था कि 2010 में हीं एक विश्वविद्यालय के अध्ययन में इस बात का जिक्र था कि इस पूरे इलाके में हेवी कंस्ट्रक्शन पर रोक लगाया जाना चाहिये । लेकिन तब से लेकर अब तक आखिर कहां सरकारें सोयी रहीं ?  व्यवस्था के नुंमाइदों को क्या तब जोशीमठ की धरती पर बहुंमंजिले होटल तामिर होते नजर नहीं आये ? 2010 से लेकर 2022 तक की सरकारों को इस बात का जरा भी ख्याल नहीं रहा कि कच्ची मिट्टी पहाड़ वाले इस इलाके की सूध ली जाये ।

दरअसल देवभूमि कहे जाने वाले इस पूरे इलाके के लिये ये बड़ी विडंबना रही कि सरकारों ने पूरे क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों की जमकर अनदेखी की । आज जोशीमठ विस्थापन का दंश झेलने वाले परिवारों में क्रंदन है ,आंखों के आंसू नहीं सूख रहे हैं और सरकार के मुखिया लोगों के मान मनौव्वल में जुटे हैं । बेहतर तो ये होता कि लोगों के शिकायत पर अनसुनी करने वाले दोषियों पर सरकार न केवल सख्ती दिखाये बल्कि कोई ऐसी व्यवस्था लाये जिससे लोगों को आपदा के इस वक्त में सरकार पर विश्वास कायम रह सके । पीड़ितों को अब सरकार ने देढ़ देढ़ लाख के मुआवजे का फौरी तौर पर ऐलान किया है जो पहले चार हजार रुपया हरेक माह का था । मेरे ख्याल से ये रकम इतनी नहीं हो सकती जिससे लोग नये स्थान पर जाकर नये सिरे से अपना जीवनयापन शुरू कर सके ।फिलहाल इस पूरे मामले में सरकार की ओर किये जा रहे पहल से बात यहां बनती नहीं दिखती है । केन्द्र और उत्तराखंड सरकार को तत्काल इस बात पर विचार करके एक वृहत योजना बनानी चाहिये जिससे लोग अपने साथ हुये इस त्रासदी को भूलकर नये सिरे से जीवन शुरू कर सके । इतना हीं नहीं चाहे वो जोशीमठ हो .कर्ण प्रयाग हो ,या उत्तरकाशी हो या फिर रुद्र प्रयाग इस पूरे क्षेत्र के लिये विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक संतुलित विकास का मॉडल तैयार करना चाहिये, न केवल तैयार करना चाहिये बल्कि वहां के स्थानिय प्रशासन को भी इस बात की ताकिद होनी चाहिये कि किसी भी कीमत पर इस मापदंड का पालन किया जाये । मकान निर्माण से लेकर किसी भी तरह के विकास कार्यों के संचालन में वहां के भौगोलिक संरचना के मद्देनजर हीं फैसला लिया जाना चाहिये ,वरना आज तो केवल अल्मोड़ा तक हीं ये मामला है कल ये पूरे पहाड़ी इलाकों के लिये एक भयावह तस्वीर पेश कर देगा और तब आने वाली त्रासदी केवल अफसोस करने का जरिया बनकर रह जायेगा ।

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