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केदारनाथ मंदिर के पास फिर हुआ एवलांच, video viral !

2013 में केदारनाथ में बादल फटने से हुई थीं 4190 मौतें

केदारनाथ मंदिर के करीब एक बार फिर एवलांच हुआ है। हालांकि, यह कितनी दूर हुआ है, इसका अभी पता नहीं चला है। श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ टेंपल कमेटी के अध्यक्ष अजेंद्र अजय ने बताया कि इससे केदारनाथ मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। इसका वीडियो सामने आया है। इससे पहले 23 सितंबर को मंदिर से करीब 5 किमी पीछे बने चौराबाड़ी ग्लेशियर में एवलांच आया था। इसका भी वीडियो सामने आया था। रुद्रप्रयाग के डिजास्टर मैनेजमेंट अधिकारी एनएस रजवार ने बताया था कि यह काफी छोटा एवलांच था। इससे नुकसान की कोई सूचना नहीं मिली है। केदारनाथ मंदिर से करीब 5 किमी पीछे बने चौराबाड़ी ग्लेशियर में गुरुवार शाम 6:30 बजे एवलांच आया। इसका वीडियो सामने आया है। हालांकि रुद्रप्रयाग के डिजास्टर मैनेजमेंट अधिकारी एनएस रजवार ने बताया कि यह काफी छोटा एवलांच था। इससे किसी तरह के नुकसान की कोई सूचना नहीं मिली है। यह वीडियो तीर्थयात्रियों ने ही रिकॉर्ड किया था। इसे देखकर लोगों को 10 साल पहले केदारनाथ में आई तबाही का मंजर याद आ गया। 2013 में केदारनाथ में बादल फटने के कारण अचानक बाढ़ आ गई थी। इस बाढ़ से पूरे उत्तराखंड में 4190 लोगों की मौत हुई थीं। आपदा की वजह केदारनाथ मंदिर से कुछ किलोमीटर ऊपर बनी चोराबाड़ी झील थी। झील में 16 जून 2013 की रात ग्लेशियर से हिमस्खलन हुआ था। इसका पानी तबाही मचाते हुए नीचे उतरा और हजारों लोगों की मौत हो गई। बाढ़ के दौरान केदारनाथ धाम में करीब 3 लाख श्रद्धालु फंस गए थे, जिन्हें बाद में आर्मी, एयरफोर्स और नेवी के जवानों ने रेस्क्यू कर बचा लिया था। हालांकि, उसके बाद भी 4 हजार से ज्यादा लोग लापता हो गए थे।इस साल करीब 10 लाख से ज्यादा तीर्थयात्री उत्तराखंड की चार धाम यात्रा कर चुके हैं। अब इस संख्या के कुछ साइड इफेक्ट्स भी रहे हैं, जैसे कचरा, विशेष रूप से प्लास्टिक बैग और रैपर, जो पर्यावरण के लिए खतरा हैं। इससे वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है। उनका कहना है कि इससे प्रदूषण और नेचुरल डिजास्टर्स का खतरा भी बढ़ सकता है। केदारनाथ घाटी आपदा के बाद वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान ने उत्तराखंड के सभी ग्लेशियर और आसपास की झीलों में सेंसर रिकॉर्डर लगाने शुरू कर दिए हैं। 329 झीलों में से 70% पर काम पूरा हो चुका है। संस्थान के निदेशक डॉ. कलाचंद बताते हैं कि सेंसर लगाने से यह फायदा होगा कि जैसे ही झील का जलस्तर बढ़ेगा, बादल फटेगा या हिमस्खलन होगा, संस्थान के कंट्रोल रूम को सिग्नल मिल जाएंगे। तब वैज्ञानिक तुरंत झील को ‘पंक्चर’ करने की कार्रवाई शुरू कर देंगे। पूरे हिमालय क्षेत्र में 15 हजार ग्लेशियर और 9 हजार झीलें हैं।

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