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कहीं इंटरनेट के शिकंजे में तो नहीं फंस रहा बच्चा? जानें पेरेंट्स कैसे रखें ध्यान

ऐसी खबरें, जिनमें किशोरों ने तकनीक से जुगलबंदी कर खौफनाक वारदातों को अंजाम दिया हो, बढ़ती ही जा रही हैं। क्या इसकी जड़ में ऑनलाइन दुनिया का असर काम कर रहा है

ऐसी खबरें, जिनमें किशोरों ने तकनीक से जुगलबंदी कर खौफनाक वारदातों को अंजाम दिया हो, बढ़ती ही जा रही हैं। क्या इसकी जड़ में ऑनलाइन दुनिया का असर काम कर रहा है? किशोरों की दुनिया में सूचना तकनीक के असर पर काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट डॉ. नेहा दत्त का आलेख हाल ही में हुई ऐप की घटना हो या फिर वह घटना, जिसमें तीन किशोरों ने एक अनजान शख्स को इसलिए मार दिया, क्योंकि वो अपने दोस्तों के बीच अपना रौब जमाना चाहते थे, किशोरों की बदलती दुनिया को लेकर चिंता में डालने वाली हैं। उन्होंने इसका वीडियो बनाकर वायरल भी किया। उनके चेहरे पर न कोई खौफ था, न ही पछतावा। किशोरों के हिंसक बर्तावों कीऐसी घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। कहीं वे इंटरनेट का बेजा इस्तेमाल करके लोगों को परेशान कर रहे हैं, तो कहीं किसी हिंसक वारदात को अंजाम दे रहे हैं। सवाल यह है कि किशोर उम्र में अपराध करने के लिए उन्हें कौन से हालात उकसा रहे हैं? सूचना और जानकारी का अतिरेक इसमें कोई दो राय नहीं है कि अब किशोरों की दुनिया का एक बड़ा हिस्सा इंटरनेट है। पीढ़ियों का अंतर अब उन्हें किसी उत्सुकता के समाधान के लिए अपने अभिभावकों से पहले इंटरनेट के सर्च इंजन की शरण में ले जाता है। यहां से मिली जानकारी कितनी पक्की है और उसके कितने पहलू हैं, ये महत्व के नहीं रहते। एक रिपोर्ट की मानें तो पहले की तुलना में किशोर अब अधिक खतरनाक, हिंसक और तकनीक की समझ रखने वाले अपराधों की ओर रूख कर रहे हैं, जिसके लिए इंटरनेट व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को जिम्मेदार मान सकते हैं। बढ़ती जागरूकता के चलते वे जानते भी हैं कि नाबालिग होने के कारण कड़ी सजा से बच सकते हैं। आभासी दुनिया से अपनापन ऑनलाइन मंचों पर किशोरों का वैसा ही समाज है, जैसा वास्तविक दुनिया में होता है, जिसके कारण किशोर साथियों का दबाव भी होता है। डिजिटल संचार के प्रसार ने किशोरों के अपने साथियों और रोमांटिक रुचियों के साथ बातचीत करने के तरीके को बदल दिया है। वे वास्तविक दुनिया के दोस्तों के बजाय आभासी दोस्तों से ज्यादा चैटिंग करते हैं और ऑनलाइन दुनिया को ही अपना सब कुछ मान लेते हैं, क्योंकि उनको यहां हर उत्सुकता का समाधान बिना किसी नियम लगाए मिल सकता है। वक्त पर नहीं मिलती सही राय एक बड़ा कारण यह भी है कि कई अभिभावक उनकी ऑनलाइन गतिविधियों से अनजान रह जाते हैं। कई बार अभिभावकों का सूचना प्रौद्योगिकी में अनाड़ी होना बाधा बनता है, तो कभी माता-पिता और बच्चे के बीच संवादहीनता और रिश्ते का पैटर्न भी।उस पर आज की जीवनशैली की व्यस्तता है कि बच्चे में आए बदलाव को समझ ही नहीं पाते।
जानकारी के माध्यमों को समझें बात केवल ऑनलाइन माध्यमों की ही नहीं है। कुछ अध्ययनों में भी यह बात सामने आई है कि मीडिया में हिंसा किशोरों को प्रभावित करती है और उन्हें आक्रामक बनाती है। जैसे हिंसक वीडियो गेम न केवल आक्रामक सोच को बढ़ाते हैं। उसे खेलने वाले की हृदय गति और रक्तचाप बढ़ते हैं। मारधाड़ वाले कंटेंट या ऐसे वीडियो गेम ‘हेल्पिंग बिहेवियर’ को कम करते हैं। पेरेंट्स को समझना होगा कि मीडिया का मतलब वीडियो गेम या इंटरनेट ही नहीं, टीवी, पत्रिकाएं, फिल्में, संगीत, विज्ञापन आदि भी है। बच्चों के माहौल के लोग, उनका व्यवहार, बातें और सोच भी उन्हें प्रभावित करती है। निभाएं अपनी जिम्मेदारी ● पेरेंट्स को बच्चों के साथ खुले संवाद करने की आवश्यकता है। साथ ही उन्हें बाहरी एक्टिविटी से जोड़ें। ● यह देखने की जरूरत है कि बच्चा किन वेबसाइट्स पर ज्यादा समय बिता रहा है। ● ऑनलाइन स्कूल के घंटों के बाद स्क्रीन टाइम को सीमित करना और मॉनिटर करना और बच्चों को पेपर-पेन का उपयोग करके पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है। ● यदि आप बच्चे के मूड/व्यवहार/नींद या आहार पैटर्न में कोई बदलाव देखें, जो असामान्य है तो मनोवैज्ञानिक से परामर्श लें। सही-गलत का फर्क दरअसल, इसकी वजह हम ही हैं, जिन्होंने बच्चों को नई तकनीक तो उपलब्ध करा दी है, मगर उसका इस्तेमाल कैसे करना है? वो बात बताना ही जरूरी नहीं समझ रहे। जबकि देखा जाए तो सोशल मीडिया की वजह से बहुत से लोगों ने शोहरत भी पाई है और कुछ लोगों ने इंटरनेट की मदद से अपना स्टार्टअप भी शुरू किया है। मतलब, इंटरनेट का सही इस्तेमाल बच्चे करें, इसकी जिम्मेदारी आपकी है। और, सबसे महत्वपूर्ण कि आपका किशोर ऑनलाइन क्या कर रहा है, यह जानें। किशोरों द्वारा उपयोग किए जा रहे नए ऐप्स, वेबसाइटों और सोशल मीडिया पेजों के बारे में स्वयं को शिक्षित करें और किशोरों को सुरक्षित रखने के लिए कदम उठाएं। उनको आर-रेटेड फिल्म देखने या एम-रेटेड वीडियो गेम खेलने की अनुमति न दें। उन्हें हिंसक छवियों के संपर्क में आने के खतरों के बारे में जागरूक बनाएं और उनकी मानसिक स्थिति की निगरानी करें। (लेखिका धर्मशिला नारायण सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल में काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट हैं)

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