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#SharadYadav – एक अध्याय का अंत

नहीं रहा समाजवादी नेता

वैसे खबर तो खबर के नजरिये से देखा जाये तो खाटी समाजवादी नेता शरद यादव अनंत सफर के राही हो गये हैं । खाटी इसलिये की जीवन भर खादी की धोती कुर्ता के साथ सादगी भरा जीवन यापन करने वाले, नोटबंदी से लेकर विजय माल्या या फिर अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं पर बेबाक राय रखने वाले शरद यादव की पहचान हीं एक खाटी समाजवादी की रही । कभी किसी से डरा नहीं, बड़े बड़े दबाब और सियासी झंझावातों में भी मंच से धर्मनिरपेक्षता और समाज में समरसरता का दामन नहीं छोड़ने वाले शरद यादव पचहत्तर साल की उम्र में हम सबको अलविदा कह गये । छात्र जीवन से हीं मुद्दों पर संघर्ष करना शरद यादव के जीवन का अभिन्न अंग रहा । इंजिनियरिंग की पढ़ायी करने के बाद भी शरद यादव नौकरी की बजाय जनता की आवाज़ बनने के लिये सड़कों पर उतर आये । शरद यादव से सीधे संवाद का कई मौका मुझे भी मिला जब वो लखनऊ के दौरे पर आते । उनसे तमाम मुद्दों पर बात होती, हर बार यही ऐहसास रहा कि वो किसी भी मुद्दे पर बड़े बेबाकी से तार्किक जबाब देते । जो कह दिया कभी ये नहीं कहा कि इसे आप एडिट कर लेना या फिर इसे मत चलाना । उनसे बात कीजिये या उनका पहनावा देखिये हमेशा शरद पवार में सादगी साफ दिखती । ये बात अलग है कि बड़े नेता और केन्द्रीय मंत्री तक रहने की वजह से उनके इर्द गिर्द सुरक्षा का प्रोटोकॉल रहता लेकिन जब आप उनके करीब पहुंच जाते तो घंटो न सिर्फ अपनी बात बताते बल्कि यहां के माहौल को करीब से जानने की कोशिश करते ।

बड़ी संजीदगी से किसी भी मुद्दे पर राय साझा करते । जो हमारा विश्लेषण उन्हे समझ नहीं आता तो उसको संशोधित करके बताने की भी कोशिश करते । संसद में उनके भाषणों की एक अळग हीं दिलचस्पी होती, बोलने पर आते तो फिर धारा प्रवाह अपनी बातें रखते । हर भाषण को उठा लिजिये एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिये चिंता जरुर नजर आयेगी । अन्ना हजारे आंदोलन में सांसदों के उपर केजरीवाल जैसे मंच संचालकों की ओर से की जा रही टिप्पणी पर जो भाषण शरद यादव ने संसद में दिया था वो कभी कोई भूल नहीं सकता । ये बात अलग है कि केजरीवाल आज दिल्ली के दो बार के मुख्यमंत्री बन गये और शरद यादव के लिये उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड हीं अपनी नहीं रही । मनभेद और मतभेद की वजह से शरद यादव ने केवल जेडीयू को छोड़कर अपनी राह पकड़ी बल्कि 2022 में अपनी बनायी नयी पार्टी का राष्ट्रीय जनता दल में विलय कर लिया । बात विचारधारा की है और जिस विचारधारा को शरद यादव ताउम्र जीते रहे वो हीं विचारधारा आज शरद यादव को सर्वदलीय नेता के रुप में स्थापित कर गया ।

क्या बीजेपी के चाणक्य गृहमंत्री अमित शाह क्या कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी क्या बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा जेपी नड्डा की बात की जाये सबने शरद यादव को अपनी भावभीनी श्रृद्धांजलि दी । समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से लेकर तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने दलगत भावना से उपर उठकर इस खाटी समाजवादी नेता को श्रद्धासुमन अर्पित किया । देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ट्विट कर शरद यादव के निधन को अपूरणीय छति करार दिया । ये सम्मान ये जज्बात यूं हीं नहीं आते बल्कि इसके पीछे शरद यादव का एक लंबा संघर्ष रहा है । भारतीय राजनीति में करीब पांच दशकों तक शरद यादव छाये रहे ,विपक्षी एकता को मजबूत करने की हर मंच से कवायद की, सफलता मिलना या न मिलना अपनी जगह है लेकिन हमने देखा कि कैसे वो पंथनिरपेक्षता की रक्षा के लिये अपने आखिरी दौर तक सक्रिय रहे । बहरहाल भारतीय लोकतंत्र में शरद यादव नाम का सितारा बेशक अस्त हो गया हो लेकिन समाजवादी विचारधारा के हर मंच पर शरद यादव को वैसे हीं याद किया जायेगा जैसे ज्योतिबसु, जॉर्ज फर्नांडिस या मुलायम सिंह यादव को याद किया जाता है । शरद यादव ने न केवल लोहिया की विचारधारा को पढ़ा बल्कि उसे अपने जीवन में उतरकर भी दिखाया ।हमारा तो ये साफ मत है कि शरद यादव सरीखे नेता बेशक हर इंसान की तरह जीवन और मौत के शिकंजे में हों लेकिन ऐसी शख्सियतों की विचारधारा हमेशा जीवंत रही है और आगे भी रहेगी ।

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