विदेश

20वीं सदी का चिड़ियाघर जहां होती थी इंसानों की नुमाइश

20वीं सदी तक दुनिया के कई देशों में ‘काले लोगों’ की प्रदर्शनी लगाई जाती थी. उन्हें जानवरों की तरह चिड़ियाघर में रखा जाता था. हाल के दिनों में आयोजित दो प्रदर्शनियों ने इस क्रूर औपनिवेशिक इतिहास की झलक दिखाई है

20वीं सदी तक दुनिया के कई देशों में ‘काले लोगों’ की प्रदर्शनी लगाई जाती थी. उन्हें जानवरों की तरह चिड़ियाघर में रखा जाता था. हाल के दिनों में आयोजित दो प्रदर्शनियों ने इस क्रूर औपनिवेशिक इतिहास की झलक दिखाई है.बेल्जियम के उपनिवेश कांगो की 267 महिलाओं और पुरुषों को ब्रुसेल्स के उपनगर टर्वुरेन में एक बड़े पार्क के पीछे कहीं रखा गया था. उन्हें इंसानों की तरह नहीं, बल्कि ऐसे रखा गया था जैसे वे किसी चिड़ियाघर में थे. इन लोगों को किंग लियोपोल्ड द्वितीय के कहने पर बेल्जियम लाया गया था. उन्हें यूरोपीय जनता के सामने प्रदर्शनी के तौर पर दिखाने के लिए नकली ‘कांगो गांव’ बसाया गया. यहां फूस की छत वाली झोपड़ियां बनी थी. इन्हीं झोपड़ियों में ये रहते थे. 1897 के विश्व मेले में हर दिन 40 हजार लोग इन्हें देखने आते थे. मेला समाप्त होने तक इनमें से सात लोगों की मौत हो गई थी. इनके सम्मान में 19वीं सदी के अंत में औपनिवेशिक संग्रहालय बनाया गया जिसे अफ्रीका म्यूजियम टर्वुरेन नाम दिया गया. इस संग्रहालय का अब तक कई बार पुनर्निर्माण हो चुका है और इसके नाम बदले जा चुके हैं.

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