विदेश

युद्धग्रस्त यूक्रेन से भारत लौटने की राह में दुश्वारियां कम होती नहीं दिख रही हैं।

भारतीय दूतावास ने कीव से कर्फ्यू हटने के बाद सभी भारतीयों को रेलगाड़ियाें के जरिए पश्चिमी हिस्से में पहुंचने का सुझाव दिया

युद्धग्रस्त यूक्रेन से भारत लौटने की राह में दुश्वारियां कम होती नहीं दिख रही हैं। भारतीय दूतावास ने कीव से कर्फ्यू हटने के बाद सभी भारतीयों को रेलगाड़ियाें के जरिए पश्चिमी हिस्से में पहुंचने का सुझाव दिया, लेकिन वह भी आसान नहीं था। किसी तरह भारतीय स्टूडेंट रेलवे स्टेशन पहुंचे तो वहां ट्रेन नहीं मिल रही थी। कुछ लोग वहां से लौट गए। जबकि कुछ ने तमाम धक्का-मुक्की के बाद ट्रेन पकड़ने में कामयाब रहे। अब वे उत्तर-पश्चिमी के शहर लवीव की ओर बढ़ रहे हैं।

कीव से बाहर निकलने में कामयाब रहे भारतीयों के समूह में जशपुर की प्रगति मिश्रा भी हैं। उनके पिता रामजी मिश्र ने दैनिक भास्कर को बताया, दूतावास की एडवाइजरी मिलने के बाद यूनिवर्सिटी के सभी भारतीय स्टूडेंट रेलवे स्टेशन के लिए निकले। रेलवे स्टेशन पहुंचने के लिए कोई कैब या बस नहीं मिल रही थी। बाहर निकलने की जल्दी में सभी लोग 18 किलोमीटर पैदल चलकर रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां भारी भीड़ थी और यू्क्रेनी लोग भी उन्हीं ट्रेनों से पश्चिमी प्रदेशों की ओर जा रहे थे। ऐसे में वे लोग भारतीयों को ट्रेन में नहीं चढ़ने दे रहे थे। कुछ स्टूडेंट वहां से घबराकर वापस लौट गए। उनकी बेटी के साथ 30-40 स्टूडेंट वहीं रुके। करीब 5-6 ट्रेन गुजरने के बाद उन्हें एक ट्रेन मिली है। वह भी सीधे बार्डर नहीं ले जाएगी। वहां पहुंचकर उन लोगों को बस करनी पड़ेगी। उसके बाद किसी तरह उन्हें हंगरी बार्डर पहुंचना है।

27 फरवरी से रोमानिया के कैंप में पड़ हैं शिवम

अंबिकापुर के शिवम सिंह विन्नित्सिया शहर के एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ते हैं। शिवम वहां से 450 किमी की दूरी तय कर किसी तरह रोमानिया के बार्डर पहुंचे। उसके लिए यूनिवर्सिटी ने बस का इंतजाम किया लेकिन उसके लिए पैसे लिए जा रहे थे। दूतावास के हस्तक्षेप के बाद किसी तरह मामला सुलझा। जद्दोजहद के बाद किसी तरह 27 फरवरी को बॉर्डर पार किया। तबसे वे बुडापेस्ट के एक कैंप में पड़े हुए हैं। उनको फ्लाइट कब मिलेगी यह नहीं पता।

श्रेष्ठा पांच दिन पहले निकली थीं अभी तक एयरपोर्ट पर ही

दल्ली राजहरा की श्रेष्ठा नायर पांच दिन पहले पोलैंड बार्डर पहुंच गई थीं। उन्होंने 26 फरवरी की सुबह छत्तीसगढ़ सरकार की हेल्पलाइन पर फोन किया था। उन्होंने बताया था कि यहां भारी भीड़ है और पोलैंड की ओर जाने नहीं दिया जा रहा है। कहीं से कोई मदद नहीं मिली। तीन दिन बाद पोलैंड में उन लोगों को एंट्री दी गई। अब वे दो दिनों से वारसा एयरपोर्ट पर पड़ी हैं। तापमान -2 डिग्री सेल्सियस है उसमें किसी तरह दिन कट रहा है।

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