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ब्रेन इम्प्लांट की सबसे कारगर तकनीक, इसे वैज्ञानिकों ने 5 साल पहले विकसित किया

जर्मनी के एक अस्पताल में लकवा (Amyotrophic Lateral Sclerosis) से जूझ रहे 34 साल के युवक ने ब्रेन इम्प्लांट के जरिये बातचीत की है

जर्मनी के एक अस्पताल में लकवा (Amyotrophic Lateral Sclerosis) से जूझ रहे 34 साल के युवक ने ब्रेन इम्प्लांट के जरिये बातचीत की है। कुछ साल पहले ही पता चला था कि इस युवक के दिमाग के सेल्स तेजी से डिजेनरेट हो रहे हैं। कह सकते हैं कि जिस आदमी के आई बॉल्स भी नहीं हिल रहे थे, उसने इस टेक्नोलॉजी की मदद से जर्मन में कुछ शब्द कहे। उसका मतलब था- खाने में मुझे करी के साथ आलू फिर और उसका सूप चाहिए।

जेनेवा के तुबिंगेन यूनिवर्सिटी में बायोमेडिकल इंजीनियर रहे डॉ. उज्ज्वल चौधरी बहुत समय से ब्रेन इम्प्लान्ट के तरीके पर रिसर्च कर रहे थे।

ब्रेन इमप्लान्ट बेहोशी की स्थिति में भी मददगार डॉ चौधरी ने बताया कि इस युवक ने सीधे अपनी पलकों के बजाय अपनी आई बॉल्स के सहारे बात करने की कोशिश की। डॉ चौधरी और उनके साथियों ने कहा, ‘हम यह देख कर चौंक गए।’रिसर्च टीम के लीडर और यूनिवर्सिटी के पूर्व न्यूरो साइंटिस्ट निलस बिरबाउमर ने बताया कि दुनिया में यह पहली बार है कि जब पूरी तरह से लकवा पीड़ित इंसान बाहरी दुनिया से इस तरह से बातचीत कर पा रहा है।

ब्रेन इमप्लान्ट की मदद से आए परिणाम संभावित बहुत कारगर हो सकते हैं, यह अनकॉन्सिस या बेहोशी की स्थिति में भी मददगार हो सकते हैं।

5 साल पहले युवक ने आई मूवमेंट के जरिए परिवार से बात की 2017 में पूरी तरह से लकवे का शिकार होने से पहले युवक ने आई मूवमेंट के जरिए परिवार से बात की थी। इसके बाद युवक के परिवार वालों ने दूसरा तरीका तलाशने के लिए डॉ चौधरी और डॉ बिरबाउमर के पास गए। युवक की मंजूरी मिलने के बाद न्यूरोसर्जन और रिसर्च के राइटर डॉ जेन्स लहम्बर्ग ने दिमाग में दो छोटे इलेक्ट्रोड लगाए, जो उसकी मूवमेंट कंट्रोल कर रहे थे।

दो महीने तक पीड़ित के हाथ-पैर और जीभ की मूवमेंट पर नजर रखी, ताकि ब्रेन सिग्नल देख सकें। डॉ बिरबाउमर ने ऑडिटोरी न्यूरोफीडबैक का सुझाव दिया। फिर उन्होंने सेकंड नोट प्ले किया जो सीधा दिमाग की स्थिति मैप कर रहा था।

विवाद के चलते 5 साल पहले रिसर्च को आगे बढ़ाने पर लग गई थी रोक डॉ चौधरी, डॉ बिरबाउमर ने 5 साल पहले इस टेक्नोलॉजी पर रिसर्च की थी। तब जांच में पता चला कि उनकी रिकॉर्डिंग में पक्षपात हुआ। विवाद के बाद जर्मन रिसर्च फाउंडेशन ने इस रिसर्च को आगे बढ़ाने पर रोक लगा दी थी। साथ ही डॉ चौधरी 3 साल और डॉ बिरबाउमर पर 5 साल की रोक लगा दी थी। ये मामला कोर्ट में है।

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