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महंगाई या मंदी, किसे रोकना चाहता है US, भारत पर कैसे पड़ेगा असर

कई तिमाहियों तक इकोनॉमी में सुस्ती की वजह से मंदी की बात की जाती है। मंदी को मापने का सबसे बड़ा पैमाना जीडीपी ग्रोथ रेट होते हैं

बाइडेन एक काल्पनिक दुनिया में हैं, वह अमेरिका की महंगाई को ”पुतिन इन्फ्लेशन” नाम देना चाहते हैं।” रूस सरकार की ओर से जब ये प्रतिक्रिया दी गई तब अमेरिका का सेंट्रल बैंक फेड रिजर्व महंगाई या मंदी, दोनों में से किसी एक को चुनने की जद्दोजहद कर रहा था।

हालांकि, अब फेड रिजर्व ने ब्याज दरों में रिकॉर्ड 0.75 फीसदी की बढ़ोतरी कर यह साफ कर दिया है कि उसका पहला लक्ष्य महंगाई को काबू में लाना है। यह इसलिए भी क्योंकि अमेरिका में महंगाई 40 साल के उच्चतम स्तर पर है। अब यह भी तय माना जा रहा है कि अमेरिकी इकोनॉमी शॉर्ट टर्म मंदी की ओर जा रही है। वहीं, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इकोनॉमी शॉर्ट टर्म के लिए ही सही लेकिन मंदी आ चुकी है।

मंदी का मतलब: दरअसल, कई तिमाहियों तक इकोनॉमी में सुस्ती की वजह से मंदी की बात की जाती है। मंदी को मापने का सबसे बड़ा पैमाना जीडीपी ग्रोथ रेट होते हैं। अनुमान है कि अमेरिका की ग्रोथ रेट 1 फीसदी से भी नीचे जा सकती है। इस बात को हवा अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेड रिजर्व के अनुमान से मिली है। सेंट्रल बैंक का अनुमान है कि 2022 का GDP ग्रोथ 1.7 फीसदी रहेगा, जो पहले 2.8 फीसदी पर रखा गया था। फेड रिजर्व का अनुमान वर्तमान हालात को देखते हुए है लेकिन आगे और भी सिकुड़न की आशंका है।

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