सरकार की महत्वाकांक्षी फैमिली आईडी बनाने की मुहिम गांवों में जमीनी हकीकत से टकरा रही है। सूची में दर्ज कई लाभार्थी वर्षों पहले गांव छोड़कर दूसरे शहरों में बस चुके हैं, जबकि कुछ परिवार मोबाइल नंबर और ओटीपी साझा करने से ही इन्कार कर रहे हैं। हाथरस के एक गांव में तो ग्रामीण ने यहां तक कह दिया कि क्या नई आफत है यह, हमें इसकी कोई जरूरत नहीं है।
साफ है कि ग्राम पंचायत अधिकारियों को घर-घर पहुंचने के बावजूद फैमिली आईडी बनाने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। ग्राम पंचायत उदयभान भकरोई में ग्राम पंचायत अधिकारी अभिषेक गुप्ता फैमिली आईडी बनाने के लिए सूची में शामिल लाभार्थियों के घर पहुंचे।
गांव की सूची के अनुसार नीतू देवी विधवा पेंशन की लाभार्थी हैं, लेकिन उनकी फैमिली आईडी अभी तक नहीं बनी थी। जब अधिकारी उनके घर पहुंचे तो मकान पर ताला लगा मिला। पड़ोसियों से जानकारी करने पर पता चला कि नीतू देवी अपने बच्चों के साथ दिल्ली में रहकर काम करती हैं और लंबे समय से गांव नहीं आई हैं। उनके पास संपर्क के लिए मोबाइल नंबर भी उपलब्ध नहीं था। इस कारण उनकी फैमिली आईडी नहीं बनाई जा सकी।
इसी प्रकार ग्राम पंचायत महराम बाग में सूची में शामिल विष्णु शर्मा, जो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के लाभार्थी भी हैं, गांव में नहीं मिले। परिजनों ने बताया कि वह अपनी ससुराल आगरा में रहते हैं। परिवार ने उनका मोबाइल नंबर देने से भी इन्कार कर दिया, जिससे उनकी फैमिली आईडी का सत्यापन और पंजीकरण नहीं हो सका। ग्राम पंचायत अधिकारियों का कहना है कि कई लाभार्थी गांव से बाहर रह रहे हैं, जबकि कई लोग मोबाइल पर आने वाला ओटीपी साझा करने से भी हिचक रहे हैं। इन कारणों से सरकार की फैमिली आईडी बनाने की प्रक्रिया गांवों में अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही है।

