काशी विद्वत परिषद ने वाराणसी शहर के महाश्मशान घाट मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर मसाने की होली खेलने की परंपरा का विरोध किया है। दावा किया है कि यह परंपरा शास्त्रों के अनुसार नहीं है।
ये है परंपरा
मसाने की होली या भस्म होली एक परंपरा है जो रंगभरी एकादशी के अगले दिन खेली जाती है, जो होली की शुरुआत का प्रतीक है। यह परंपरा वाराणसी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर खेली जाती है। जहां साधु और भक्त जलती हुई चिताओं की राख और गुलाल से होली खेलते हैं।
मसान शब्द का मतलब श्मशान घाट होता है और यह जीवन और मृत्यु के चक्र और शिव के त्याग का प्रतीक है। भक्त राख के इस्तेमाल को मौत और वैराग्य की याद दिलाने वाला बताते हैं।
परिषद के सदस्य विनय पांडेय ने दावा किया कि महाश्मशान में होली मनाना शास्त्रों की परंपराओं के अनुसार नहीं है। कुछ लोगों ने इसे पुराना रिवाज बताकर हाल के कुछ वर्षों में ही यह आयोजन शुरू किया है। पांडेय ने दावा किया श्मशान से एक खास पवित्रता जुड़ी होती है। यह जश्न मनाने की जगह नहीं है। युवा अब वहां स्थापित परंपराओं को तोड़ रहे हैं।

