15 अगस्त 1947 की वो सुबह… जब अलीगढ़ की गलियों में गूंजा- ‘देश आजाद हो गया’, बच्चों के हाथ में आई गरम जलेबी

5 Min Read
15 अगस्त 1947 की सुबह: अलीगढ़ की गलियों में गूंजा, देश आजाद हो गया और अंग्रेज चले गए, बंटी जलेबी

अलीगढ़: आजादी की कहानी सिर्फ किताबों के पन्नों, भाषणों और तिरंगे तक सीमित नहीं है। देश की आजादी की पहली सुबह को जिन लोगों ने अपनी आंखों से देखा, उनके लिए 15 अगस्त 1947 की याद आज भी भावनाओं से भरी हुई है। अलीगढ़ के कुछ बुजुर्गों की स्मृतियों में उस ऐतिहासिक दिन की सबसे खूबसूरत तस्वीर गलियों में गूंजते आजादी के नारे और हाथ में आई गरम जलेबी की है।

अलीगढ़ में कचौड़ी-जलेबी का नाश्ता आज भी शहर की खास पहचान माना जाता है। लेकिन यहां के बुजुर्गों के लिए जलेबी की मिठास में आजादी की पहली खुशी भी घुली हुई है। उस वक्त ये लोग बच्चे या किशोर थे। उन्हें आजादी के राजनीतिक और ऐतिहासिक मायने पूरी तरह समझ नहीं आए थे, लेकिन माहौल में फैली खुशी को उन्होंने जरूर महसूस किया था।

सुबह-सुबह हर तरफ सुनाई दे रहा था- ‘देश आजाद हो गया’

मानिक चौक निवासी 93 वर्षीय मंगलसेन को 15 अगस्त 1947 की सुबह आज भी साफ याद है। वह बताते हैं कि उस दिन मोहल्ले का माहौल बिल्कुल अलग था। बड़े लोग बेहद उत्साहित थे और बच्चे यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर हुआ क्या है।

गलियों में लोगों के बीच यही बातें हो रही थीं कि देश आजाद हो गया, स्वराज मिल गया और अंग्रेज देश छोड़कर चले गए।

मंगलसेन बताते हैं कि जब वह घर से बाहर निकले तो किसी ने बच्चों में गरम जलेबी बांटी। हाथ में जलेबी आते ही बच्चों की खुशी और बढ़ गई। उस उम्र में आजादी की गहराई भले समझ नहीं आई, लेकिन उन्हें इतना जरूर महसूस हुआ कि यह दिन आम दिनों जैसा नहीं था।

बड़े आजादी की बात कर रहे थे, बच्चे जलेबी और खेल में मशगूल थे

ब्रह्मनपुरी निवासी 93 वर्षीय रमेश वार्ष्णेय भी उस सुबह को याद करते हुए बताते हैं कि मोहल्ले में सुबह से ही चहल-पहल थी। बड़े लोग आजादी को लेकर चर्चा कर रहे थे, जबकि बच्चे कभी उनकी बातें सुनते और फिर खेल-कूद में लग जाते।

रमेश वार्ष्णेय के मुताबिक, उस समय उन्हें आजादी का असली अर्थ मालूम नहीं था। कई साल बाद जब इतिहास पढ़ा और समझ आया कि 15 अगस्त 1947 का दिन देश के लिए कितना बड़ा था, तब उन्हें एहसास हुआ कि जिस ऐतिहासिक पल को उन्होंने बचपन में जलेबी खाते और खेलते हुए देखा था, वह वास्तव में भारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन था।

‘उस जलेबी का स्वाद आज भी याद है’

91 वर्षीय मोहनलाल वार्ष्णेय के लिए भी 15 अगस्त 1947 की याद जलेबी से जुड़ी है। वह बताते हैं कि उस सुबह वातावरण में कुछ अलग ही महसूस हो रहा था। बड़े लोग उत्साहित थे और बच्चे भी आजादी के नारे लगा रहे थे।

देश आजाद होने की खबर से हर कोई खुश था, हालांकि बच्चों को उस खुशी की पूरी वजह तब समझ नहीं आती थी।

समय बीता, देश बदला और बचपन भी पीछे छूट गया। लेकिन मोहनलाल के मुताबिक, उस दिन खाई गई जलेबी का स्वाद आज भी उनकी यादों में कायम है।

उनके लिए वह जलेबी सिर्फ एक मिठाई नहीं थी। वह आजादी की पहली खुशी की मिठास थी, जो बचपन की स्मृतियों के साथ आज तक जुड़ी हुई है।

79 साल बाद भी यादों में जिंदा है आजादी का पहला सवेरा

15 अगस्त 1947 को भारत ने ब्रिटिश शासन से आजादी हासिल की थी। उस ऐतिहासिक दिन को देखने वाली पीढ़ी अब बहुत छोटी रह गई है। ऐसे में अलीगढ़ के इन बुजुर्गों की यादें उस दौर की एक अलग तस्वीर सामने रखती हैं।

उनकी स्मृतियों में आजादी का पहला दिन किसी भारी-भरकम इतिहास की तरह नहीं, बल्कि गलियों की चहल-पहल, बड़ों की खुशी, बच्चों के नारे और गरम जलेबी की मिठास के रूप में दर्ज है।

शायद यही वजह है कि 79 साल बाद भी उस सुबह की जलेबी का स्वाद उनकी यादों में फीका नहीं पड़ा।

Share This Article
Exit mobile version