UP: शिशु के मल की फोटो से एप बता देगा बीमारी है या नहीं, लोहिया संस्थान ने तैयार किया एआई आधारित मोबाइल एप

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UP: शिशु के मल की फोटो से एप बता देगा बीमारी है या नहीं, लोहिया संस्थान ने तैयार किया एआई आधारित मोबाइल एप

डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के बाल रोग विभाग ने एक नया मोबाइल एप लॉन्च किया है। यह एप शिशु के मल की फोटो देख बीमारियों का पता लगाएगा। इस नवाचार को पेटेंट भी मिल चुका है। बाल रोग विभाग का यह लिवर पूप एप अभी https://liverpoop.netlify.app/ पर उपलब्ध है जो जल्द ही प्ले स्टोर पर आएगा।

बुधवार को संस्थान के एडमिन ब्लॉक में मुख्य अतिथि और संस्थान के निदेशक प्रो. सीएम सिंह ने लिवर पूप एप को लॉन्च किया। उन्होंने बताया कि यह भारत का पहला एआई आधारित मोबाइल एप है। इससे शिशुओं को समय पर इलाज मिल पाएगा। बाल हेपेटोलॉजिस्ट एवं गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. पीयूष उपाध्याय ने इसे 500 शिशुओं पर तीन वर्ष के अध्ययन के आधार पर तैयार किया है।

डॉ. पीयूष ने बताया कि एप बनाने का मुख्य उद्देश्य नवजात शिशुओं को खतरनाक बीमारी बिलीरी एट्रेसिया (पित्तवाहिनी अवरोध) से बचाना है। लॉन्चिंग के दौरान विशिष्ट अतिथि डीन डॉ. प्रद्युमन सिंह, सीएमएस प्रो. विक्रम सिंह, बाल रोग विभाग की अध्यक्ष प्रो. दीप्ति अग्रवाल व अन्य चिकित्सक मौजूद रहे।

इसलिए जरूरी है यह एप

डॉ. पीयूष बताते हैं कि बिलीरी एट्रेसिया ऐसी बीमारी है, जिससे शिशु की पित्त नली अवरुद्ध हो जाती है। अगर जन्म के 60 दिन के भीतर इसका पता चल जाए तो बच्चे की जान बचाई जा सकती है। 90 दिन की देरी के बाद केवल लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र रास्ता बचता है, जो अत्यंत महंगा और जटिल है। इसका मुख्य उद्देश्य समय पर बीमारी को पहचान कर लिवर ट्रांसप्लांट की स्थिति को रोकना है। यह एप इसमें मदद करेगा।

इस्तेमाल करना है बेहद आसान

एप में शिशु के मल की फोटो क्लिक करके अपलोड करनी होगी। एप मल के रंग के आधार पर विश्लेषण कर बता देगा कि शिशु का लिवर सामान्य है या यह संभावित बीमारी का संकेत दे रहा है।

एप की विशेषताएं

एआई : एप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से बच्चों के मल के रंग और अन्य संकेतों का विश्लेषण कर लिवर से जुड़ी बीमारियों का शुरुआती चरण में पता लगा सकता है।

40 भाषाओं में उपलब्ध: एप को वैश्विक बनाने के लिए 22 भारतीय और 18 विदेशी भाषाओं में उपलब्ध कराया गया है।

अभिभावकों के लिए वरदान: मुफ्त में अभिभावक घर बैठे यह समझ सकेंगे कि उनके बच्चे का पाचन और लिवर स्वास्थ्य सामान्य है या नहीं।

शत-प्रतिशत सेंसिटिविटी: 500 शिशुओं पर तीन वर्ष तक अध्ययन के दौरान एप की सेंसिटिविटी 100% पाई गई।

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