UP: ‘सीवर, फैक्टरी का कचरा और अतिक्रमण’, ऐसे दम तोड़ रही सरायन नदी; ग्राउंड रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

5 Min Read
UP: ‘सीवर, फैक्टरी का कचरा और अतिक्रमण’, ऐसे दम तोड़ रही सरायन नदी; ग्राउंड रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

यूपी के सीतापुर में सरायन नदी को बचाने के लिए योजनाओं और दावों की कमी नहीं रही। समय-समय पर नदी के पुनर्जीवन, अतिक्रमण हटाने और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाने की घोषणाएं होती रहीं। बैठकों में अफसरों ने नदी को स्वच्छ बनाने के दावे किए, लेकिन हकीकत दावों से अलग है। आज भी शहर का गंदा पानी बिना उपचार के सीधे सरायन में गिर रहा है।

शहर के आलमनगर, नई बस्ती, सिविल लाइंस और अन्य इलाकों से निकलने वाला घरेलू सीवर बिना शोधन के नदी तक पहुंच रहा है। पूरे शहर में एक भी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) नहीं है। शहर का मल-मूत्र सीधे नदी में गिर रहा है। फैक्टरियों का कचरा, शहर की गंदगी, अतिक्रमण और प्लास्टिक व जलकुंभी सरायन की बर्बादी के चार प्रमुख कारण हैं।

फैक्टरियों का कचरा

चीनी मिलों का अपशिष्ट और शहर के सीवर सरायन के लिए प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत बन चुके हैं। हरगांव और कमलापुर चीनी मिल का कचरा व अपशिष्ट प्रभावित क्षेत्रों के नालों के जरिये नदी में गिरता है। चीनी मिल के कचरे में शीरा, गंदा पानी, सल्फेट और भारी तत्व होते हैं। इनसे पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है। इससे जलीय जीव खत्म होने लगते हैं।

शहरी गंदगी

सीतापुर के ज्यादातर सीवर और करीब 36 बड़े-छोटे नालों का गंदा पानी बिना शोधन सरायन में गिरने से प्राकृतिक जल दूषित हो रहा है। कई जगह नदी नाले में तब्दील हो गई है। घरेलू मलजल के साथ ठोस कचरा और अन्य प्रदूषक भी नदी में पहुंच रहे हैं। सीतापुर की पेपर मिलों का खतरनाक रसायन भी इसी नदी में बहाया जा रहा है।

अवैध कब्जे

सरायन की बदहाली का बड़ा कारण किनारों और फ्लड प्लेन पर बढ़ता अतिक्रमण है। नदी की जमीन पर अवैध कब्जों से प्राकृतिक फैलाव सिमट गया है। कई जगह खेती, निर्माण और अन्य गतिविधियों ने प्रवाह मार्ग को बाधित कर दिया है। इससे बरसात का पानी नदी तक नहीं पहुंच पाता और भूजल रिचार्ज भी प्रभावित होता है।

जलकुंभी और प्लास्टिक कचरा

सरायन में प्लास्टिक कचरे और जलकुंभी ने समस्या गंभीर बना दी है। शहर व आसपास के क्षेत्रों से बहकर आने वाला प्लास्टिक कचरा नदी के प्रवाह में बाधा बन रहा है, जबकि जलकुंभी ऑक्सीजन घटा देती है। इससे जलीय जीवों का जीवन प्रभावित होता है और प्राकृतिक जैव विविधता कमजोर पड़ती है।

खत्म हो गए प्राकृतिक सोते

सरायन किसी बड़ी नदी से नहीं निकली, बल्कि ये प्राकृतिक सोतों (स्प्रिंग्स), वर्षाजल और स्थानीय जलग्रहण क्षेत्र पर निर्भर है। नालों, जलकुंभी, गाद, तालाबों के खत्म होने, अतिक्रमण और जलग्रहण क्षेत्र के क्षरण से प्राकृतिक स्रोत खत्म हो गए। इससे सरायन में शहर के नालों का पानी ही बचा है।

गोमती को भी कर रही बीमार

सिधौली के हिंदौरा गांव के पास सरायन जब गोमती में मिलती है, तो यह अपने साथ लाखों लीटर जहरीला पानी भी आदि गोमती में मिला देती है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे भूजल प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है।

सरकार का सहयोग नहीं

पूर्व नगर पालिका परिषद अध्यक्ष आशीष मिश्र ने 2006 में सरायन की सफाई का अभियान शुरू कराया था। इस दौरान जलकुंभी, गाद और ठोस कचरा हटाने का काम किया गया। शहर के सीवर और औद्योगिक अपशिष्ट का गिरना जारी रहने के कारण यह प्रयास लंबे समय तक प्रभावी साबित नहीं हो सका। मिश्र कहते हैं कि नदी सरकार की उपेक्षा का शिकार है। 2006 में जब सफाई अभियान चलाया तो भी सरकार ने सहयोग नहीं दिया।

तटबंध का निर्माण और पौधरोपण किया जाएगा

सरायन के जीर्णोद्धार की रणनीति बनाई गई है। इसके तहत नदी क्षेत्र में आने वाले तालाबों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों का पुनरुत्थान शामिल है। नदी का सीमांकन किया जाएगा। तटबंध का निर्माण और पौधरोपण किया जाएगा। नदी तट पर अवैध कब्जे हटाए जाएंगे। बीबीएयू के प्रोफेसर वेंकटेश दत्ता की रिपोर्ट के सुझावों को भी कार्ययोजना में शामिल किया है। -डॉ. राजा गणपति आर, डीएम, सीतापुर

 

Share This Article
Leave a Comment

Please Login to Comment.

Exit mobile version