दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और इकलौता सुपरपावर कहा जाने वाला अमेरिका इस समय अपनी ‘अग्निपरीक्षा’ से गुजर रहा है। पिछले एक साल में जबरदस्त मजबूती दिखाने वाली अमेरिकी इकोनॉमी अब एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहाँ एक तरफ युद्ध का भारी खर्च है और दूसरी तरफ आसमान छूती तेल की कीमतें। जानकारों का मानना है कि अगर ईरान के साथ यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो अमेरिका एक ऐसी महा-मंदी की चपेट में आ सकता है, जिससे निकलना उसके लिए नामुमकिन होगा।
ईंधन की कीमतों ने तोड़ी कमर युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका में पेट्रोल (गैसोलीन) की कीमतें 3 डॉलर प्रति गैलन से नीचे थीं, लेकिन अब यह 4 डॉलर के पार पहुंच गई हैं। सबसे बुरा हाल डीजल का है, जो ट्रकिंग और माल ढुलाई के लिए जीवनरेखा माना जाता है। युद्ध शुरू होने के बाद से डीजल की कीमतों में 47% का उछाल आया है और यह 5.50 डॉलर प्रति गैलन के ऊपर निकल गया है। इससे न केवल आम जनता की जेब ढीली हो रही है, बल्कि सामानों की ढुलाई महंगी होने से हर चीज के दाम बढ़ रहे हैं।
खेत से लेकर चिप फैक्ट्रियों तक संकट यह संकट सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से उन चीजों की सप्लाई रुक गई है जिन पर आधुनिक दुनिया टिकी है:
खेती: यूरिया और खाद की कीमतें बढ़ने से किसानों पर 50,000 डॉलर तक का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। टेक्नोलॉजी: हाई-एंड कंप्यूटर चिप्स बनाने के लिए जरूरी ‘हीलियम’ की 35% सप्लाई कतर से आती है। इसके रुकने से टेक इंडस्ट्री ठप हो सकती है। मेडिकल: अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले एमआरआई (MRI) उपकरणों के लिए भी हीलियम अनिवार्य है, जिसकी कमी अब महसूस होने लगी है। मंदी की आहट KPMG की चीफ इकोनॉमिस्ट डायने स्वोंक ने चेतावनी दी है कि यदि होर्मुज की घेराबंदी 4 से 6 हफ्तों तक जारी रहती है, तो अमेरिका में मंदी आना तय है। उन्होंने 2026 के लिए विकास दर का अनुमान 2.6% से घटाकर मात्र 1% कर दिया है। अर्थशास्त्री डर रहे हैं कि अमेरिका 1970 के दशक जैसी स्टैगफ्लेशन की स्थिति में पहुंच सकता है, जहां महंगाई चरम पर होती है और विकास दर शून्य हो जाती है।
युद्ध खत्म होने पर भी तुरंत राहत नहीं राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि वे बहुत जल्द सैन्य लक्ष्य हासिल कर लेंगे, लेकिन एक्सपर्ट्स की राय अलग है। तेल के कुओं को एक बार बंद करने के बाद उन्हें फिर से शुरू करने में महीनों का समय लगता है। साथ ही, युद्ध में क्षतिग्रस्त हुए बुनियादी ढांचे की मरम्मत में सालों लग सकते हैं। ऐसे में युद्ध खत्म होने के बाद भी तेल की कीमतों के पुराने स्तर पर लौटने की संभावना बहुत कम है।

