किरावली के कुकथला गांव में 500 से अधिक किसान जामुन की बागवानी और पौधों की नर्सरी से दोहरी आय अर्जित कर रहे हैं। यहां का जामुन दिल्ली की मंडियों तक पहुंच रहा है और बेहतर उत्पादन व अच्छे दाम से किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है। आगरा के बिचपुरी तहसील किरावली के गांव कुकथला में जामुन की बागवानी किसानों के लिए लाभ का साधन बन रही है। गांव के 500 से ज्यादा किसान बागवानी के साथ नर्सरी उगाकर दोहरा लाभ कमा रहे हैं। यहां के जामुन दिल्ली की मंडियों तक पहुंच रहे हैं। इस वर्ष बेहतर उत्पादन और बढ़े बाजार भाव से किसानों को अच्छी आय मिली है।
किसान जीवन सिंह कुशवाह बताते हैं कि उनके दो बीघा खेत में 40 वर्ष पुराना जामुन का बाग है, जिसमें लगभग 80 पेड़ हैं। मेड़ों पर जामुन के पेड़ और खेत में आंवला, अशोक, सेब और नाशपाती की नर्सरी तैयार की जाती है। जामुन से उन्हें करीब डेढ़ लाख रुपये वार्षिक शुद्ध लाभ होता है। वहीं तीन लाख रुपये की आय नर्सरी से हो जाती है। अन्य किसान भी लगभग इसी तरह कमाई करते हैं।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष जामुन की तुड़ाई 6 जून से शुरू हो गई थी, जो 10 जुलाई तक चलेगी। वर्तमान में जामुन 50 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहा है, जबकि शुरुआत में इसके दाम 100 से 150 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंचे थे। प्रतिदिन फसल दिल्ली की मंडियों में भेजी जा रही है।
किसान प्रेम सिंह ने बताया कि बारिश होने पर फल एक साथ पकते हैं, जिससे तुड़ाई का दबाव बढ़ जाता है और मौसम का सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। किसान मंगल सिंह के अनुसार एक पेड़ की तुड़ाई चार दिन के अंतराल पर की जाती है। मजदूरों को 20 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान किया जाता है।
कलमी जामुन 3-4 साल में देने लगता है फल
कृषि विज्ञान केंद्र बिचपुरी के उद्यान विशेषज्ञ अनुपम दुबे ने बताया कि कलमी जामुन के पौधे तीन से चार वर्ष में फल देने लगते हैं, जबकि थाईलैंड ब्लैक जैसी उन्नत किस्में 2 से 3 वर्ष में उत्पादन देने लगती हैं। बीज से तैयार पौधों में फल आने में 8 से 10 वर्ष लग सकते हैं। उन्होंने बताया कि व्यावसायिक खेती के लिए राजा जामुन, सीआईएसएच जे-37, सीआईएसएच जे-42 और थाईलैंड ब्लैक किस्में उपयुक्त हैं। आगरा क्षेत्र में जुलाई-अगस्त का मानसून काल रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त समय है।
निश्चित दूरी पर करें रोपाई
पौधों की रोपाई 8×8 या 10×10 मीटर की दूरी पर करनी चाहिए। रोपाई से एक माह पहले गड्ढों में गोबर की खाद, ट्राइकोडर्मा और क्लोरपायरीफॉस मिलाकर छोड़ दें। पौधों को शुरुआती वर्षों में सहारा देना और जैविक खाद का प्रयोग लाभकारी रहता है। पाले से बचाने के लिए सर्दी के दिनों में भी सिंचाई करनी चाहिए।

