दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और जाति आधारित आरक्षण के विरोध में हुए प्रदर्शन के बीच इस मुद्दे पर सियासत तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) के प्रमुख रामदास आठवले ने आरक्षण का विरोध करने या इसे खत्म करने की मांग करने वालों के खिलाफ राजद्रोह जैसी कड़ी कार्रवाई की मांग की है। वहीं, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी साफ किया है कि आरक्षण किसी की दी हुई ‘खैरात’ नहीं, बल्कि संविधान से मिला अधिकार है।
आठवले बोले- आरक्षण का विरोध संविधान का विरोध
रामदास आठवले ने रविवार को जारी बयान में कहा कि आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर इसे खत्म करने या इसमें बदलाव की मांग को लेकर चलाए जा रहे अभियानों ने इस बहस को फिर से तेज कर दिया है।
आठवले ने कहा कि आरक्षण का विरोध संविधान का विरोध है। उनके मुताबिक, जो लोग आरक्षण विरोधी रुख अपनाते हैं, वे संविधान-विरोधी हैं और उनके खिलाफ राजद्रोह के तहत कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण संविधान प्रदत्त अधिकार है, इसलिए इसे खत्म नहीं किया जा सकता।
हालांकि, यहां एक कानूनी पहलू भी महत्वपूर्ण है। भारत में पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A के तहत ‘राजद्रोह’ का प्रावधान अब लागू नहीं है। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS) में इसकी जगह धारा 152 के तहत भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित अलग अपराध का प्रावधान है। इसलिए आठवले की ‘राजद्रोह’ वाली मांग को उनके राजनीतिक बयान के रूप में देखना जरूरी है; केवल आरक्षण का विरोध करना अपने आप में BNS की धारा 152 के तहत अपराध साबित नहीं करता।
चिराग पासवान ने कहा- आरक्षण कोई खैरात नहीं
इस विवाद के बीच केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने भी आरक्षण को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि आरक्षण किसी को दी गई खैरात नहीं, बल्कि संविधान से मिला अधिकार है और इसे किसी के मांगने मात्र से खत्म नहीं किया जा सकता।
चिराग ने अपने पुराने बयान का हवाला देते हुए कहा कि उनकी और उनकी पार्टी की सोच आरक्षण को लेकर स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि आरक्षण को समाप्त करने की बात तो दूर, इसकी समीक्षा भी उन्हें स्वीकार्य नहीं है।
हालांकि चिराग पासवान ने प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत का रास्ता भी खुला रखा है। उन्होंने कहा कि अगर प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को व्यवस्थित और स्पष्ट तरीके से सरकार के सामने रखते हैं, तो सरकार उनसे बातचीत करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण को लेकर किसी भी तरह की गलतफहमी देश के एक बड़े वर्ग में नाराजगी पैदा कर सकती है।
जंतर-मंतर पर क्या मांग कर रहे हैं प्रदर्शनकारी?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 अगस्त को बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जुटे थे। प्रदर्शनकारियों ने जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग की और कहा कि सरकारी सहायता तथा आरक्षण का आधार केवल जाति के बजाय आर्थिक स्थिति को भी बनाया जाना चाहिए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने एससी/एसटी एक्ट में बदलाव या उसे समाप्त करने की मांग भी उठाई।
प्रदर्शन ‘Reservation Reform Andolan’ और अन्य संगठनों के बैनर तले हुआ। प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशंस को लेकर भी आपत्ति जताई। रिपोर्टों के मुताबिक, आंदोलन में जनरल और अनारक्षित वर्ग से जुड़े लोगों की बड़ी भागीदारी रही।
जंतर-मंतर प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस ने क्या कहा?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच दिल्ली पुलिस ने 23 अगस्त को स्पष्ट किया कि उस दिन जंतर-मंतर पर आरक्षण सुधार को लेकर किसी प्रदर्शन या सभा के लिए अनुमति नहीं दी गई थी। पुलिस ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ऐसे पोस्ट और वीडियो को भ्रामक बताया और लोगों से अपील की कि वे अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर वहां एकत्र न हों। नई दिल्ली जिले में BNSS की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू होने की भी पुलिस ने जानकारी दी।
इससे पहले 21 अगस्त के प्रदर्शन के दौरान भी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच अनुमति को लेकर विवाद हुआ था। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान जाने को कहा था, जबकि प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर ही बने रहने पर अड़े रहे।
आरक्षण पर बढ़ती राजनीतिक बहस
आरक्षण को लेकर ताजा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब जाति आधारित आरक्षण के भविष्य, आर्थिक आधार और मौजूदा व्यवस्था में सुधार को लेकर अलग-अलग वर्गों की मांगें सामने आ रही हैं। एक तरफ प्रदर्शनकारी आर्थिक स्थिति को आरक्षण और सरकारी सहायता का प्रमुख आधार बनाने की मांग कर रहे हैं, वहीं आठवले और चिराग पासवान जैसे नेता मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में हैं।
चिराग पासवान ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग के संदर्भ में EWS के लिए मौजूदा 10 प्रतिशत आरक्षण का भी उल्लेख किया है।
फिलहाल इस मुद्दे पर सरकार की ओर से आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करने या व्यापक समीक्षा का कोई निर्णय सामने नहीं आया है। ऐसे में जंतर-मंतर से उठी मांगों और नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद आरक्षण पर राजनीतिक बहस आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है।
एक जरूरी तथ्य
रामदास आठवले ने आरक्षण विरोधियों पर ‘राजद्रोह’ की कार्रवाई की मांग की है, लेकिन इसे सरकार द्वारा ऐसा कोई आदेश जारी किए जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह आठवले की मांग है। मौजूदा आपराधिक कानून में IPC की पुरानी राजद्रोह की धारा 124A हटाई जा चुकी है और BNS में धारा 152 अलग प्रकृति के कृत्यों को अपराध बनाती है।

