पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने कहा है कि एशिया का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत और चीन अपने समानांतर उत्थान को किस तरह संभालते हैं। उन्होंने भारत और चीन को एशिया की दो प्रमुख शक्तियां, बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और सभ्यतागत राष्ट्र बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चलती रहेगी।
जनरल चौहान ने यह बात शनिवार को नई दिल्ली के प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय परिसर में आयोजित 22वें भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत स्मृति व्याख्यान में कही। कार्यक्रम पंडित गोविंद बल्लभ पंत की 139वीं जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था। उनके संबोधन का विषय ‘Threats & Challenges to India’s Security’ था।
चीन के साथ संबंध सिर्फ सीमा विवाद तक सीमित नहीं
भारत-चीन संबंधों पर बात करते हुए पूर्व CDS ने कहा कि दोनों देशों के रिश्तों को केवल सीमा विवाद के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। उनके मुताबिक, भारत और चीन कुछ क्षेत्रों में सहयोग करते हैं, जबकि प्रभाव और बाजारों को लेकर दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा भी है। क्षेत्रीय और वैश्विक व्यवस्था के कई मुद्दों पर दोनों देशों के विचार अलग हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को चीन के साथ संवाद और संपर्क बनाए रखने की जरूरत है। उन्होंने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) जैसे बहुपक्षीय मंचों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन माध्यमों से भी दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रहती है।
हालांकि, चौहान ने चीन को भारत के लिए “दीर्घकालिक और व्यापक” सुरक्षा चुनौती भी बताया। उन्होंने कहा कि भारत-चीन सीमा विवाद अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की पारस्परिक रूप से स्वीकार्य परिभाषा भी नहीं है। सीमा पर अलग-अलग धारणाएं, बुनियादी ढांचे का विकास और बढ़ती सैन्य क्षमताएं तनाव की स्थिति पैदा कर सकती हैं।
पाकिस्तान को लेकर भी पूर्व CDS ने किया आगाह
अपने संबोधन में जनरल चौहान ने पाकिस्तान को भारत के लिए आने वाले समय में भी बड़ी सुरक्षा चिंता बताया। उन्होंने कहा कि सीमा पार आतंकवाद के कारण पाकिस्तान एक प्रमुख सुरक्षा चुनौती बना रहेगा।
परमाणु हथियारों और पाकिस्तान की रणनीति का जिक्र करते हुए उन्होंने ‘स्थिरता-अस्थिरता विरोधाभास’ की बात कही। उनके अनुसार, परमाणु हथियारों ने रणनीतिक स्तर पर एक तरह की स्थिरता पैदा की है, लेकिन इसी स्थिति से निचले स्तर पर अस्थिरता और उप-पारंपरिक गतिविधियों के लिए गुंजाइश बढ़ सकती है।
चौहान ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के साथ किसी संभावित प्रॉक्सी वॉर की लागत बढ़ाने की जरूरत है, ताकि आतंकवाद और सीमा पार गतिविधियों को नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की उसकी क्षमता पर असर पड़े।
बदलती दुनिया में भू-राजनीतिक अनिश्चितता बड़ी चुनौती
पूर्व CDS ने वैश्विक सुरक्षा वातावरण में तेजी से हो रहे बदलावों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पुरानी वैश्विक शक्ति-संतुलन व्यवस्था कमजोर पड़ रही है, जबकि नई विश्व व्यवस्था की संस्थाएं और संरचनाएं अभी पूरी तरह आकार नहीं ले पाई हैं।
उन्होंने बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के साथ तकनीक, साइबर क्षेत्र, सूचना और समुद्री क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को भी सुरक्षा चुनौती का हिस्सा बताया। उनके मुताबिक, भविष्य के संघर्ष केवल पारंपरिक सैन्य मोर्चों तक सीमित नहीं रहेंगे।
‘कॉग्निटिव कॉलोनियलिज्म’ से भी सावधान रहने की जरूरत
जनरल चौहान ने अपने संबोधन में ‘कॉग्निटिव कॉलोनियलिज्म’ की अवधारणा का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे ऐसी कोशिश के रूप में बताया जिसमें किसी समाज की सोच, मूल्यों, भरोसे और भविष्य को देखने के नजरिए को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है।
उन्होंने संकेत दिया कि आधुनिक संघर्षों में किसी देश की जमीन या बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के साथ-साथ लोगों की सोच और सूचना के वातावरण को प्रभावित करना भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
आत्मनिर्भरता और कम बाहरी निर्भरता पर जोर
बदलते सुरक्षा वातावरण के बीच चौहान ने भारत की अपनी क्षमता मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने आपूर्ति श्रृंखलाओं और संसाधनों के विविधीकरण, बाहरी निर्भरता कम करने तथा देश की कमजोरियों को घटाने की जरूरत बताई।
उन्होंने कहा कि भारत को भविष्य की चुनौतियों के लिए केवल सैन्य क्षमता ही नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी, साइबर, सूचना और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी तैयार रहना होगा।
भारत के लिए संदेश: संवाद भी, तैयारी भी
जनरल चौहान के वक्तव्य का व्यापक संदेश यह है कि भारत को चीन के साथ संवाद और सहयोग के रास्ते खुले रखने के साथ अपनी सुरक्षा तैयारियों को भी मजबूत करना होगा। भारत-चीन संबंधों में सीमा विवाद एक महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है, लेकिन दोनों देशों के बीच आर्थिक, क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर संपर्क का दायरा उससे कहीं बड़ा है।
वहीं पाकिस्तान, बदलती भू-राजनीति, तकनीकी बदलाव और गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियां भारत के लिए अलग-अलग स्तरों पर जोखिम पैदा करती हैं। ऐसे में पूर्व CDS ने भारत के लिए संवाद, प्रतिरोधक क्षमता और रणनीतिक आत्मनिर्भरता—तीनों को महत्वपूर्ण बताया है।
