प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों का स्थानांतरण केवल पत्नी की सुविधा, नाबालिग बच्चे की देखभाल या किसी अन्य जिले में भरण-पोषण का मामला लंबित होने के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि स्थानांतरण का आदेश तभी दिया जा सकता है, जब यह सिद्ध हो कि बिना स्थानांतरण के संबंधित पक्ष को निष्पक्ष न्याय मिलना संभव नहीं है।
न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए पत्नी द्वारा दायर स्थानांतरण याचिका खारिज कर दी। साथ ही अलीगढ़ स्थित परिवार न्यायालय को पति की ओर से दाखिल दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना संबंधी याचिका का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश दिया।
दरअसल, पत्नी ने अलीगढ़ परिवार न्यायालय में लंबित दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की याचिका को गौतम बुद्ध नगर के परिवार न्यायालय में स्थानांतरित किए जाने की मांग की थी। उसका कहना था कि वह अपनी नाबालिग बेटी के साथ गौतम बुद्ध नगर में रहती है। अलीगढ़ आना-जाना आर्थिक रूप से कठिन है और इससे बेटी की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। पत्नी ने यह भी तर्क दिया कि उसका भरण-पोषण संबंधी मामला पहले से गौतम बुद्ध नगर की अदालत में लंबित है, इसलिए दोनों मामलों की सुनवाई एक ही न्यायालय में होना न्यायोचित होगा।
वहीं, पति की ओर से दलील दी गई कि पत्नी का मायका और ननिहाल दोनों अलीगढ़ में ही हैं। स्थानांतरण की मांग केवल मुकदमे की सुनवाई में विलंब करने के उद्देश्य से की गई है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि स्थानांतरण की शक्ति का उपयोग केवल न्यायहित में किया जाता है, न कि किसी पक्ष की व्यक्तिगत सुविधा के लिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि केवल सुविधा को स्थानांतरण का आधार बनाया जाए तो न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भरण-पोषण और दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना से जुड़े मुकदमों की प्रकृति और उद्देश्य अलग-अलग होते हैं। इसलिए उनका अलग-अलग अदालतों में लंबित होना स्थानांतरण का वैध आधार नहीं माना जा सकता।

