रूस पर कड़े प्रतिबंध से बढ़ा कच्चे तेल की सप्लाई का जोखिम, भारत के लिए भी खड़ी हो सकती हैं मुश्किलें

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रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने से कच्चे तेल की सप्लाई पर जोखिम बढ़ा, भारत के लिए भी खड़ी हो सकती हैं समस्याएं

नई दिल्ली: रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने की अमेरिकी कोशिशों से वैश्विक कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। अमेरिकी सीनेट में रूस प्रतिबंध विधेयक पारित होने के बाद रूसी कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने का जोखिम बढ़ा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और चीन को होने वाली रूसी तेल की सप्लाई में तत्काल कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना कम है।

Kpler के एनालिस्ट सुमित रितोलिया के मुताबिक, प्रस्तावित प्रतिबंधों का असर काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन इन्हें कितनी सख्ती से लागू करता है।

रूस के सबसे बड़े तेल खरीदारों पर निशाना

अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को रूस पर प्रतिबंधों से जुड़ा एक विधेयक पारित किया है। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों के आयात पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूसी तेल और गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं।

लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एक्ट ऑफ 2026 का मुख्य उद्देश्य रूसी तेल और गैस की बिक्री से होने वाली कमाई को कम करना है। हालांकि, विधेयक को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बाद भी इसे लागू करने से पहले कई विधायी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।

प्रतिबंधों का समय होगा बेहद अहम

सुमित रितोलिया के अनुसार, प्रस्तावित प्रतिबंधों के सामने अभी कई विधायी और प्रशासनिक बाधाएं हैं। ऐसे में इनका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका इन्हें कितनी आक्रामकता से लागू करता है।

उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों का समय भी बेहद महत्वपूर्ण होगा। वैश्विक कच्चे तेल बाजार में पहले से ही अपेक्षाकृत तंग सप्लाई की स्थिति है और पश्चिम एशिया से होने वाली सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में रूसी तेल पर बड़ा प्रतिबंध मौजूदा व्यापार को केवल दूसरे रास्तों पर मोड़ने के बजाय वैश्विक तेल बाजार में और दबाव पैदा कर सकता है।

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से बढ़ा भारत का तेल आयात

फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात काफी बढ़ाया। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और यूरोपीय खरीदारों के रूसी तेल से दूरी बनाने के बाद रूस ने एशियाई खरीदारों को भारी छूट की पेशकश की।

अमेरिकी एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के अनुसार, 2021 में रूस भारत को प्रतिदिन एक लाख बैरल से भी कम कच्चा तेल भेजता था। यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 2.5 प्रतिशत था।

2022 में यह मात्रा बढ़कर करीब 7.4 लाख बैरल प्रतिदिन हो गई, जबकि 2023 में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात लगभग 18 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। इस दौरान रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बन गया और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी करीब 39 प्रतिशत रही।

जुलाई में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रूसी तेल आयात

Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 में भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से रिकॉर्ड करीब 28 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया। यह भारत के 50 लाख बैरल प्रतिदिन से कुछ अधिक के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 55.5 प्रतिशत था।

2024 में भारत का रूस से औसत कच्चा तेल आयात करीब 18 लाख बैरल प्रतिदिन रहा था। रितोलिया के अनुसार, रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए एक महत्वपूर्ण सप्लाई विकल्प बन चुका है। इसकी वजह से मध्य पूर्व के पारंपरिक तेल सप्लाई रूट में किसी तरह की बाधा आने पर भारत को कुछ हद तक राहत मिलती है।

रूसी तेल की सप्लाई घटी तो बढ़ सकता है कच्चे तेल का भाव

विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा मात्रा में रूसी कच्चे तेल की जगह दूसरे स्रोतों से तेल उपलब्ध कराना कम समय में बेहद मुश्किल हो सकता है। अगर भारत और अन्य एशियाई खरीदारों को रूसी तेल की सप्लाई में अचानक बड़ी कटौती का सामना करना पड़ा, तो वैश्विक तेल बाजार में मांग और उपलब्धता का संतुलन बिगड़ सकता है।

इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बढ़ सकते हैं।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी असर संभव

रूसी तेल की सप्लाई में बड़ी गिरावट का असर केवल भारतीय रिफाइनरियों की खरीद लागत तक सीमित नहीं रहेगा। इससे देश का कुल कच्चा तेल आयात बिल बढ़ सकता है, चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं पैदा हो सकती हैं।

सुमित रितोलिया के मुताबिक, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वैश्विक बाजार में इतनी वैकल्पिक तेल सप्लाई उपलब्ध है, जो रूसी कच्चे तेल की कमी को पूरा कर सके और इसके कारण वैश्विक बाजार में अतिरिक्त दबाव भी न पैदा हो।

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