फर्रुखाबाद: दिव्यांगजनों को उपकरण उपलब्ध कराने के लिए मिले सरकारी अनुदान में कथित घोटाले के मामले में पूर्व विधायक लुईस खुर्शीद और डॉ. जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट के सचिव अतहर फारुकी की मुश्किलें बढ़ गई हैं। दोनों सोमवार को फर्रुखाबाद की एमपी-एमएलए कोर्ट में पेश हुए, जहां अदालत ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं में आरोप तय किए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों आरोपियों के खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट भी निरस्त कर दिए। मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी।
कई महीनों से जारी था अतहर फारुकी के खिलाफ वारंट
मामले की जांच आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन (EOW), लखनऊ ने की थी। तत्कालीन निरीक्षक रामशंकर यादव की जांच के आधार पर 10 जून 2017 को कायमगंज कोतवाली में ट्रस्ट के प्रतिनिधि प्रत्यूश शुक्ला के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
आरोप था कि दिव्यांगजनों को उपकरण वितरित करने के नाम पर कागजों में कई शिविर दिखाए गए और सरकारी धन का कथित रूप से दुरुपयोग किया गया। जांच आगे बढ़ने पर ट्रस्ट के सचिव अतहर फारुकी और परियोजना निदेशक लुईस खुर्शीद के नाम भी सामने आए।
आरोपपत्र दाखिल होने के बाद से मामला अदालत में विचाराधीन है। अतहर फारुकी के लगातार अदालत में पेश नहीं होने के कारण उनके खिलाफ कई महीनों से गैर-जमानती वारंट जारी थे।
अदालत ने अतहर फारुकी को हिरासत में लेने का आदेश दिया
सोमवार को दोनों आरोपी अपने अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार चौहान के साथ अदालत पहुंचे। बचाव पक्ष ने गैर-जमानती वारंट निरस्त करने के लिए प्रार्थना पत्र दिया। अदालत को यह भी बताया गया कि लुईस खुर्शीद को इलाहाबाद हाईकोर्ट से अंतरिम अग्रिम जमानत मिली हुई है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने अतहर फारुकी को हिरासत में लेने का आदेश दिया। हालांकि, अधिवक्ता की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने उन्हें जमानत दे दी। दोनों आरोपियों ने 50-50 हजार रुपये के निजी बंधपत्र दाखिल किए, जिसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
जांच में फर्जी दस्तावेजों का दावा
EOW की जांच के मुताबिक, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 30 मार्च 2010 को ट्रस्ट को 71.50 लाख रुपये का सरकारी अनुदान दिया था। इसमें से 4 लाख रुपये फर्रुखाबाद के दिव्यांगजनों को उपकरण उपलब्ध कराने के लिए निर्धारित किए गए थे।
जांच में 29 मई 2010 को कायमगंज में कथित रूप से आयोजित एक शिविर से संबंधित 32 लाभार्थियों की सूची वाली टेस्ट चेक रिपोर्ट सामने आई। इस दस्तावेज पर तहसीलदार कायमगंज और मुख्य चिकित्साधिकारी के सत्यापन तथा प्रतिहस्ताक्षर होने का दावा किया गया था।
हालांकि, जांच के दौरान दोनों अधिकारियों के हस्ताक्षर और मुहर कथित तौर पर फर्जी और कूटरचित पाए गए। इसके अलावा, जिस शिविर के आयोजन का रिकॉर्ड दिखाया गया था, उसके वास्तविक रूप से आयोजित होने का भी कोई प्रमाण जांच एजेंसी को नहीं मिला।
इन्हीं तथ्यों के आधार पर सरकारी अनुदान के कथित दुरुपयोग और फर्जीवाड़े का मामला दर्ज किया गया था। अब अदालत में आरोप तय होने के बाद मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी।

