उत्तर प्रदेश के राज्य कर विभाग के मानव संपदा पोर्टल में कथित अनधिकृत गतिविधि ने विभागीय डिजिटल व्यवस्था की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गाजियाबाद जोन में 22 राज्यकर्मियों की वित्तीय वर्ष 2024-25 की वार्षिक प्रविष्टियों में कथित तौर पर बदलाव कर प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज किए जाने का मामला सामने आया है। कुछ कर्मचारियों की सत्यनिष्ठा पर भी सवाल खड़े करने वाली प्रविष्टियां दर्ज होने की बात कही जा रही है। राज्य कर आयुक्त डॉ. नितिन बंसल ने मामले में जांच के आदेश दिए हैं और साइबर फ्रॉड की आशंका जताई है।
अधिकारियों की आईडी से हुई प्रविष्टियां, लेकिन करने से इनकार
मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि जिन अधिकारियों की यूजर आईडी से कर्मचारियों की वार्षिक प्रविष्टियां दर्ज दिखाई गई हैं, उन्होंने खुद ऐसी प्रविष्टियां करने से इनकार किया है। प्रभावित कर्मचारियों का आरोप है कि अधिकारियों के पासवर्ड रिसेट कर किसी मास्टर एडमिन या उच्चस्तरीय लॉगइन के माध्यम से पोर्टल पर बदलाव किए गए।
हालांकि, अभी जांच पूरी नहीं हुई है और यह स्पष्ट नहीं है कि पासवर्ड वास्तव में किसने और किस तरीके से रिसेट किए। यही वजह है कि मामले में तकनीकी लॉग, लॉगइन हिस्ट्री, आईपी एड्रेस और इस्तेमाल किए गए डिवाइस की जांच महत्वपूर्ण होगी।
22 कर्मचारी प्रभावित, सूची में 23 प्रविष्टियां
गाजियाबाद जोन के संगठन की ओर से उपलब्ध कराई गई सूची में 23 प्रविष्टियां हैं, जबकि प्रभावित कर्मचारियों की संख्या 22 बताई गई है। सूची में रोहित पाराशर का नाम एक ही मानव संपदा आईडी के साथ दो बार दर्ज है। वहीं प्रदीप कुमार नाम की दो प्रविष्टियों में अलग-अलग मानव संपदा आईडी दर्ज होने की बात सामने आई है।
प्रभावित कर्मचारियों में नितिन विजेता मित्तल, विकास त्यागी, अनुज राय, मोहित दुबे, अजय कुमार, ज्योति पाली, रमेश प्रताप सिंह दीक्षित, सचिन कुमार, रामानंद यादव, कल्पना, वरुण चौहान, प्रदीप कुमार, भोपाल, रोहित पाराशर, विपिन कुमार, नवीन कुमार, रजिया खान, रामेंद्र सिंह, प्रिंस कुमार, प्रदीप कुमार, अजय कश्यप और रोहित वर्मा के नाम शामिल हैं।
तीन कर्मचारियों की पदोन्नति पर असर
कथित तौर पर बदली गई वार्षिक प्रविष्टियों का असर कर्मचारियों की सेवा संबंधी प्रगति पर भी पड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी प्रविष्टियों के कारण तीन कर्मचारियों की पदोन्नति रुक गई है। कुछ अन्य कर्मचारियों के वित्तीय उन्नयन यानी एसीपी लाभ पर भी संकट खड़ा होने की बात सामने आई है।
वार्षिक प्रविष्टि सरकारी कर्मचारियों के सेवा रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इसलिए किसी कर्मचारी के रिकॉर्ड में प्रतिकूल टिप्पणी या सत्यनिष्ठा से जुड़ी प्रतिकूल प्रविष्टि का असर उसके करियर से जुड़े फैसलों पर पड़ सकता है।
जांच में इन सवालों के मिलने हैं जवाब
अब जांच में सबसे अहम सवाल यह होगा कि संबंधित प्रविष्टियां वास्तव में किस यूजर आईडी से बदली गईं। इसके अलावा यह भी पता लगाना होगा कि अधिकारियों के पासवर्ड कब और किस माध्यम से रिसेट हुए तथा संबंधित लॉगइन किस आईपी एड्रेस और डिवाइस से किया गया।
यदि जांच में किसी बाहरी या अनधिकृत व्यक्ति द्वारा सरकारी डिजिटल सिस्टम में प्रवेश की पुष्टि होती है, तो मामला केवल वार्षिक प्रविष्टियों में गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहेगा। इसके बाद सरकारी डिजिटल रिकॉर्ड में अनधिकृत प्रवेश और उसमें बदलाव की कानूनी पहलुओं से भी जांच करनी पड़ सकती है। फिलहाल यह जांच का विषय है और किसी व्यक्ति की भूमिका की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी।
राज्य कर विभाग ने दिए जांच के आदेश
राज्य कर आयुक्त डॉ. नितिन बंसल ने मामले में जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने साइबर फ्रॉड की आशंका जताई है और गाजियाबाद में राज्य कर विभाग के अपर आयुक्त को मामले की जांच के निर्देश दिए हैं। प्रभावित कर्मचारियों की ओर से भी शासन से एफआईआर दर्ज कराकर पूरे मामले की जांच कराने की मांग की गई है।
मानव संपदा पोर्टल पर ही होती हैं वार्षिक प्रविष्टियां
उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य कर्मचारियों की वार्षिक प्रविष्टियों को मानव संपदा पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन करने की व्यवस्था लागू की है। शासन के निर्देशों के मुताबिक समूह ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ और ‘घ’ के कर्मचारियों की वार्षिक प्रविष्टियों की प्रक्रिया ऑनलाइन की जा रही है। रिपोर्टिंग, समीक्षा और स्वीकृति की प्रक्रिया भी पोर्टल पर निर्धारित समयसीमा के अनुसार होती है।
गाजियाबाद का यह मामला इसी डिजिटल व्यवस्था की सुरक्षा और निगरानी तंत्र को लेकर सवाल खड़े करता है। जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि यह किसी मानवीय त्रुटि का परिणाम था, पासवर्ड के दुरुपयोग का मामला था या वास्तव में पोर्टल में साइबर सेंधमारी हुई थी।
