हाथरस जिले के गांवों को कचरा मुक्त बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए कचरा निस्तारण केंद्र अब खुद बदहाली की तस्वीर बनते जा रहे हैं। जिले की 462 ग्राम पंचायतों में से 445 में कचरा निस्तारण केंद्र बनाए गए हैं। इन पर करीब 40.05 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आई है। लेकिन कई केंद्रों पर ताले लटके हैं, परिसर में घास उगी है और कुछ जगहों पर कचरा भी जमा है।
विभागीय रिकॉर्ड में इनमें से 316 केंद्रों के क्रियाशील होने का दावा किया जा रहा है, जबकि स्थानीय स्तर पर की गई पड़ताल में बमुश्किल 15 से 20 केंद्र ही ऐसे मिले, जहां वास्तव में कचरा निस्तारण की व्यवस्था संचालित दिखाई दी। इस अंतर ने गांवों में ठोस कचरा प्रबंधन की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गौरतलब है कि कचरा प्रबंधन के लिए बनाए गए आरआरसी केंद्रों के बंद या अनुपयोगी रहने की समस्या हाथरस में पहले भी सामने आ चुकी है। दिसंबर 2025 में भी स्थानीय रिपोर्टों में कई केंद्रों पर ताले लगे होने, उनके बाहर उपले पाथे जाने और कुछ केंद्रों के जर्जर होने की बात सामने आई थी।
40 करोड़ से ज्यादा खर्च, फिर भी गांवों में कूड़े के ढेर
कचरा निस्तारण केंद्रों का उद्देश्य गांवों से एकत्रित कचरे को व्यवस्थित तरीके से अलग करना और उसका निस्तारण करना है। इसके लिए केंद्रों पर गीले और सूखे कचरे को अलग करने समेत अन्य व्यवस्थाएं विकसित की गई हैं।
लेकिन संचालन और रखरखाव की कमी के चलते कई केंद्र अपने उद्देश्य से भटकते दिखाई दे रहे हैं। नतीजा यह है कि ग्रामीण इलाकों में खुले स्थानों पर कचरा जमा होने की समस्या बनी हुई है। इससे दुर्गंध, गंदगी और संक्रमण का खतरा बढ़ने की आशंका रहती है।
पीहुरा में घास और गोबर से घिरा केंद्र
ग्राम पंचायत पीहुरा में बने एकीकृत ठोस कचरा प्रबंधन केंद्र की स्थिति खराब मिली। केंद्र के आसपास लंबी घास उगी हुई है और मुख्य द्वार के पास गोबर व गंदगी पड़ी है।
परिसर के हालात देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि लंबे समय से यहां नियमित गतिविधियां नहीं हुई हैं। केंद्र तक पहुंचने के लिए भी पर्याप्त और सुगम रास्ते की व्यवस्था नहीं दिखाई दी।
ममौता कलां में निर्माण के बाद से लटका है ताला
सासनी क्षेत्र की ग्राम पंचायत ममौता कलां में ग्रामीणों का कहना है कि कचरा निस्तारण केंद्र बनने के बाद से ही नियमित रूप से संचालित नहीं हुआ। केंद्र के मुख्य द्वार पर ताला लगा मिला और परिसर में भी घास उगी हुई थी।
कचरा अलग करने के लिए बनाई गई हौदियां भी खाली पड़ी थीं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब केंद्र का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा तो गांवों से निकलने वाले कचरे का निस्तारण किस व्यवस्था के तहत किया जा रहा है।
मीरपुर में केंद्र के अंदर ही जमा मिली गंदगी
सादाबाद के मीरपुर गांव में भी कचरा निस्तारण केंद्र की स्थिति संतोषजनक नहीं मिली। केंद्र के अंदर ही गंदगी का ढेर पड़ा था और आसपास लंबी घास उगी हुई थी।
नियमित संचालन नहीं होने के कारण ग्रामीणों को कचरा फेंकने के लिए दूसरे स्थानों का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे गांव में जगह-जगह कचरा जमा होने की समस्या बनी हुई है।
लढ़ौता में जर्जर होने लगी लाखों की इमारत
सासनी के लढ़ौता गांव में बना कचरा निस्तारण केंद्र भी उपयोग के अभाव में जर्जर होने लगा है। आरोप है कि निर्माण के बाद से ही इसका नियमित इस्तेमाल नहीं हुआ।
देखरेख और संचालन के अभाव में जिस भवन का इस्तेमाल गांव के कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए होना था, वह अब खुद बदहाली का शिकार है।
विभाग का दावा- केंद्रों को कराया जा रहा क्रियाशील
वहीं, जिला पंचायतराज विभाग का कहना है कि जिले में सभी कचरा निस्तारण केंद्रों को क्रियाशील कराने की प्रक्रिया चल रही है। जिला पंचायतराज अधिकारी राकेशबाबू के अनुसार कई केंद्र बेहतर स्थिति में हैं और संचालित भी हो रहे हैं।
यह दावा जमीनी स्थिति से कितना मेल खाता है, यह नियमित संचालन, कचरा संग्रहण और उसके वास्तविक निस्तारण की व्यवस्था से ही स्पष्ट होगा।
आंकड़ों में हाथरस की कचरा प्रबंधन व्यवस्था
- कुल ग्राम पंचायतें: 462
- बनाए गए कचरा निस्तारण केंद्र: 445
- प्रति केंद्र औसत निर्माण लागत: करीब 9 लाख रुपये
- कुल खर्च: करीब 40.05 करोड़ रुपये
- विभागीय रिकॉर्ड में क्रियाशील केंद्र: 316
- जमीनी पड़ताल में नियमित रूप से संचालित मिले: करीब 15-20
हाथरस में असली चुनौती अब सिर्फ कचरा निस्तारण केंद्रों का निर्माण नहीं, बल्कि उन्हें नियमित रूप से चलाना और गांवों से निकलने वाले कचरे को वास्तव में इन केंद्रों तक पहुंचाकर उसका निस्तारण सुनिश्चित करना है। करोड़ों रुपये की लागत से बने ढांचे तभी उपयोगी साबित होंगे, जब उनका संचालन कागजों के बजाय जमीन पर दिखाई दे।
